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इनके लिए दाल-चावल नहीं है बिरयानी से कम, खबर जानकर स्तब्ध रहने को होंगे मजबूर

हम आपको उस जनजाति के बारे में बताने जा रहे हैं जो पेट भरने के लिए कुछ ऐसा करते हैं जिनके बारे में हम सोच भी नहीं सकते हैं।

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नई दिल्ली। दुनिया में अधिकतर लोग खाने-पीने के शौकीन होते हैं। स्वादिष्ट व लजीज डिशेज को देखकर खुद को रोक पाना वाकई में बेहद मुश्किल है। जैसा कि हम जानते हैं कि हम में से कुछ लोगों को वेज खाना पसंद है तो वही कुछ लोग नॉन वेज के शौकीन होते हैं। कभी-कभार हम अपने खाने को लेकर बहुत चूजी भी हो जाते हैं। खासकर बच्चों में इस तरह की आदतें देखी जाती है। खाने में थोड़ी ऊंच-नीच होने पर हम उसे खाना पसंद नहीं करते या बेमन से थोड़ा खाकर आधी प्लेट में छोड़ देते हैं। दैनिक जीवन में ऐसा अकसर देखने को मिलता है।

हम जानते हैं कि दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जिन्हें दो वक्त का खाना भी मुश्किल से नसीब हो पाता हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें भोजन के अभाव में कई दिनों तक भूखे पेट सोना पड़ता है। इस तरह की घटनाओं को या तो हमनें अपनी आंखों से देखा है या फिर अखबारों या किताबों में पढ़ा है। आज हम आपको उस जनजाति के बारे में बताने जा रहे हैं जिनके लिए चावल या दाल किसी हीरें-मोती से कम नहीं है। पेट भरने के लिए यहां के लोग कुछ ऐसा करते हैं जिनके बारे में हम सोच भी नहीं सकते हैं।

हम यहां बात कर रहे हैं बिहार की मुसहर जाति के बारे में, जो अपनी मजबूरी के चलते चूहे खाकर पेट भरते हैं। मुसहर जाति के लोग जंगल से घोंघे और चूहे पकड़कर लाते हैं और उसी को आग में भूनकर अपना पेट भरते है।

पहले ये लोग केवल बिहार तक ही सीमित थे लेकिन जनसंख्या में वृद्धि के चलते अब ये झारखंड और उत्तर प्रदेश में भी फैल गए हैं। इस पिछड़े वर्ग की खबर सभी को हैं लेकिन इस बारे में अब तक कोई कार्यवाही नहीं की गई है। आज जहां देश में हर क्षेत्र में विकास का झंडा फहराया जा रहा है वहां इस तरह की छवि वाकई में सोचने को मजबूर कर देती है।