यहां पर रहते है रामनामी समुदाय के लोग हैं जो पूरे शरीर में राम लिखते हैं ।ये लोग ना तो कभी मंदिर जाते है और ना ही किसी मूर्ति की पूजा करते है।
नई दिल्ली। हिंन्दू धर्म में भगवान राम जी का विशेष स्थान है। घर में बुजुर्ग लोग सुबह और शाम को राम नाम का जाप करते है। वहीं कुछ लोग ऐसे भी है जो किताबों में राम नाम लिखते हुए राम नाम का जप करते है। अपने देश के एक ऐसा समुदाय है जो ना तो मंदिर जाता है और नहीं ही पूजा नहीं करता है। लेकिन अपने पूरे शरीर पर राम का नाम लिखते है। जी हां, हम बात कर रहे है छत्तीसगढ़ के रामनामी संप्रदाय की।
ना मंदिर जाते है ना ही करते है मूर्ति पूजा
खबरों के अनुसार, दलित युवक परशुराम ने छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गांव चोपारा में 1890 के आसपास रामनामी संप्रदाय की स्थापना की। ऐसा कहा जाता है कि करीब 100 से अधिक सालों से इस संप्रदाय की एक अनूठी परंपरा है। ये लोग ना तो कभी मंदिर जाते है और ना ही किसी मूर्ति की पूजा करते है। इस समाज के लोग अपने पूरे बदन पर राम का नाम जपते है।
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सैंकड़ों सालों से चली आ रही है परंपरा
स्थानीय भाषा में गोदना को गोडाना कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि करीब 100 साल पहले गांव में हिंदू धर्म की ऊंची जाति ने इस समूह के लोगों को मंदिर में जाने से रोक दिया था। तब से यह प्रथा चली आ रही है। इस समाज में पैदा हुए लोगों के शरीर के कुछ हिस्से पर टैटू बनवाना आवश्यक है। आमतौर पर शिशु के दो साल का होने से पहले छाती पर टैटू बनवाया जाता है।
रामनामी वस्त्र एवं ओढ़नी
रामनामी वस्त्र एवं ओढ़नी, रामनामी संप्रदाय की एक पहचान और उनकी धार्मिक-सामाजिक गतिविधियों तथा इस सम्प्रदाय के संतों के पहनावे का महत्वपूर्ण अंग हैं। मोटे सूती सफ़ेद कपड़े की सवा दो मीटर लम्बी दो चादरें रामनामी पुरुषों एवं संतों की परम्परागत पोशाक हैं। ऊपर ओढ़ी जाने वाली चादर ओढ़नी कहलाती है। कुछ पुरुष इसी कपड़े की कमीज, कुरता या बनयान भी बनवा लेते हैं। स्त्रियां भी इसी प्रकार ओढ़नी ओढ़तीं हैं। इन ओढ़नियों पर काले रंग से रामराम नाम की लिखाई जाती है।