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पिज्जा कंपनी को कैरी बैग के लिए ग्राहक से 14 रुपए लेना पड़ा महंगा, भरने पड़े 10 लाख रुपए

Carry Bag For Pizza : चंड़ीगढ़ का है मामला, उपभोक्ता की शिकायत पर स्टेट कमीशन ने दिए निर्देश

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Carry Bag For Pizza

company charge amount for pizza carry bag

नई दिल्ली। अक्सर हम मॉल या फूड स्टोर जाते हैं तो वहां सामान के अलावा हमें कैरी बैग की कीमत अलग से चुकानी पड़ जाती है। लोग बेमन से ही सही मगर रुपए देने को मजबूर होते हैं। मगर चंड़ीगढ़ में एक जानी-मानी पिज्जा कंपनी (pizza company) को ग्राहक से कैरीबैग (carry bag) के लिए 14 रुपए चार्ज (extra charge) करने महंगे पड़ गए। इसके बदले कंपनी को 10 लाख रुपए चुकाने पड़े।

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दरअसल एक नामी पिज्जा कंपनी ने चंडीगढ़ (Chandigarh) के एक शख्स से कैरीबैग के लिए 14 रुपये लिए थे। इसे शख्स ने
उपभोक्ता फोरम के आदेशों को स्टेट कमीशन में चुनौती दी थी। स्टेट कमीशन ने उपभोक्ता फोरम के आदेश को सही ठहराते हुए दो अलग-अलग मामलों में डोमिनोज पर करीब 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। साथ ही कंपनी को कड़ी फटकार भी लगाई है। कमीशन के मुताबिक कंपनी लोगों की मजबूरी का फायदा नहीं उठाना चाहिए। हालांकि कंपनी ने अपने पक्ष में दलील दी कि वह पिज्जा को पहले से ही एक कार्डबोर्ड बाक्स में पैक कर उपभोक्ता को देते हैं। ऐसे में वह किसी को कैरीबैग देने के लिए उत्तरदायी नहीं है।

शिकायतकर्ता का नाम पंकज चांदगोठिया है। वह सेक्टर-28सी के रहने वाले हैं। वह पेशे से वकील है। उन्होंने उपभोक्ता फोरम में सेक्टर-8सी स्थित डोमिनोज, जुबिलेंट फूड वर्क्स लिमिटेड के खिलाफ शिकायत की थी। उन्होंने बताया कि दो पिज्जा लेने के लिए उन्होंने अपने ड्राइवर को स्टोर में भेजा। दो रेगुलर पिज्जा के लिए 306 रुपये मांगे गए। मगर जब बिल देखा तो उसमें कैरीबैग के लिए 14 रुपये चार्ज किए गए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि स्टोर में कहीं भी जिक्र नहीं किया गया था कि कैरीबैग के अलग से पैसे चार्ज किए जाएंगे।

फोरम ने 14 रुपये लौटाने व मानसिक पीड़ा व उत्पीड़न के लिए 100 रुपये का मुआवजा और 500 रुपये मुकदमा खर्च देने के निर्देश दिए। साथ ही कंपनी को राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग चंडीगढ़ के सेक्रेटरी के नाम पर कंज्यूमर लीगल ऐड अकाउंट में 10 हजार रुपये भी जमा करवाने के निर्देश दिए। पिज्जा कंपनी ने इन आदेशों को स्टेट कमीशन में चुनौती दे दी। मगर वहां भी उपभोक्ता की जीत हुई। नतीजतन एक साल केस चलने के बाद कंपनी को 10 लाख रुपए बतौर हर्जाना भरना पड़ा।