
तस्वीरें: एक जनसंहार जिसमें 100 दिनों में बिछ गई थीं लाखों लाशें, खून से तर हो गई थी बंजर धरती
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को युगांडा के कंपाला में बसे भारतीय समुदाय को संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने भारत-युगांडा के सदियों पुराने रिश्तों के बारे में बात की। प्रधानमंत्री तीन अफ्रीकी देशों की यात्रा के दौरान रवांडा पहुंचे हैं। यहां उन्होंने एक नरसंहार स्मारक केंद्र का भी दौरा किया जहां पर ढाई लाख लोगों के अवशेष दफन हैं। रवांडा नरसंहार तुत्सी और हुतु समुदाय के लोगों के बीच हुआ एक जातीय संघर्ष था। जानकारी के लिए बता दें कि, 1994 में 6 अप्रैल को किगली में हवाई जहाज पर बोर्डिंग के दौरान रवांडा के राष्ट्रपति हेबिअरिमाना और बुरुण्डी के राष्ट्रपति सिप्रेन की हत्या कर दी गई, जिसके बाद ये संहार शुरू हुआ। करीब 100 दिनों तक चले इस नरसंहार में 5 लाख से लेकर दस लाख लोग मारे गए। तब ये संख्या पूरे देश की आबादी के करीब 20 फीसदी के बराबर थी।
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस संघर्ष की नींव खुद नहीं पड़ी थी, बल्कि ये रवांडा की हुतू जाति के प्रभाव वाली सरकार जिसने इस जनसंहार को प्रायोजित किया था। इस सरकार का मकसद विरोधी तुत्सी आबादी का देश से सफाया था। इसमें ना सिर्फ तुत्सी लोगों का कत्ल किया गया, बल्कि तुत्सी समुदाय के लोगों के साथ जरा सी भी सहानुभूति दिखाने वाले लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया।
नरसंहार को सफल बनाने वालों में रवांडा सेना के अधिकारी, पुलिस विभाग, सरकार समर्थित लोग, उग्रवादी संगठन और हुतु समुदाय के लोग शामिल थे। हुतु और तुत्स समुदाय में लंबे समय से चली आ रही आला दर्जे की दुश्मनी एक बड़ी वजह थी। जुलाई के मध्य में इस संहार पर काबू पाया गया। हालांकि, हत्या और बलात्कार की इन वीभत्स घटनाओं ने अफ्रीका की आबादी के बड़े हिस्से के लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया है, इस घटना का असर लोगों के दिलो दिमाम पर आज भी बरकरार है। हर साल अप्रैल की शुरुआत में रवांडा सरकार अपने नागरिकों से उन हजारों लोगों को याद करने की अपील करती है।
इस संहार के बाद संयुक्त राष्ट्र यहां शांति स्थापना करने में नाकाम रहा। वहीं, पर्यवेक्षकों ने इस नरसंहार को समर्थन देने वाली फ्रांस की सरकार की भी जमकर आलोचना की। मानवाधिकार की पैरोकार अधिकांश पश्चिमी देश इस पूरे मसले को खामोशी से देखते रहे।
Published on:
25 Jul 2018 10:49 am
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