
विश्व थैलेसीमिया दिवस 2019- भारत में लाखों बच्चे हैं इस बीमारी का शिकार, तेज़ी से पसार रही है पैर
नई दिल्ली।थैलेसीमिया एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं। इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति के शरीर में रेड ब्लड सेल्स नहीं बनते जिससे शरीर में खून की कमी हो जाती है। ऐसे में इससे ग्रस्त व्यक्ति को बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। इस बीमारी की वजह से शरीर का रंग भी पीला पड़ना शुरू हो जाता है। बार-बार खून चढ़ने की वजह से शरीर की चमड़ी काली पड़ जाती है।
अनुवांशिक बीमारी है थैलेसीमिया
थैलेसीमिया एक अनुवांशिक बीमारी है जो परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है। अगर किसी नवजात बच्चे को यह बीमारी हो जाए तो जीवन भर उसे इस बीमारी के साथ रहना पड़ेगा। माता- पिता में से किसी एक को थैलेसीमिया है तो होने वाली संतान में भी इसके लक्षण दिखाई देंगे। ऐसे में गर्भवती महिलाओं को इसका खास ध्यान रखने की जरूरत होती है। थैलेसीमिया रोग से बचने के लिए माता-पिता को डीएनए परीक्षण कराना अनिवार्य होता है जिससे इस बीमारी पर नियंत्रण करना संभव हो पाए।
भारत में हर साल 8 से 10 बच्चे थैलेसीमिया ग्रस्त पैदा होते हैं
एक शोध में बताया गया है कि भारत में हार साल लगभग 8 से 10 बच्चे ऐसे जन्म लेते हैं जो थैलेसीमिया रोग की चपेट में हैं। बच्चों में इसके लक्षण तब नज़र आते हैं जब वो 6 से 18 महीने की उम्र के होते हैं। इसमें मुख्य तौर पर बच्चों का रंग पीला पड़ना, नींद पूरी ना होना, ठीक से आहार ना लेना, उल्टी, बुखार जैसे लक्षण नज़र आते हैं। भारत में मौजूदा समय की बात करें तो लगभग 2,25,000 से अधिक बच्चे ऐसे हैं जो थैलेसीमिया रोग से ग्रस्त हैं।
इलाज के लिए हो रहा है नई तकनीक का प्रयोग
इस बीमारी का इलाज बोन मेरो ट्रांसप्लांट (bone marrow transplantation) से संभव है लेकिन यह काफी महँगा पड़ता है जिसकी वजह से स्टेम सैल थैरेपी का प्रयोग किया जा रहा है जो काफी सुविधाजनक है। थैलेसीमिया की रोकथाम और लोगों को इसके खतरे के बारे में जागरूक करने के लिए ही हर साल 8 मई के दिन विश्व थैलेसीमिया दिवस मनाया जाता है।
Updated on:
07 May 2019 03:19 pm
Published on:
08 May 2019 07:02 am
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