
नई दिल्ली। आपने हॉलीवुड की फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर तो देखी होगी। इस फिल्म में मुंबई के स्लम से निकला हुआ लड़का कौन बनेगा करोड़पति जैसा एक शो जीतकर करोड़पति बन जाता है। कुछ ऐसी ही कहानी है मुंबई की स्लम बस्ती के कुर्ला में पले-बढ़े जयकुमार वैद्य की। जयकुमार अपनी और अपनी मां की मेहनत की बदौलत आज अमरीका के वर्जीनिया की यूनिवर्सिटी में रिसर्च स्कॉलर हैं।
दादा-दादी ने मां को घर से निकाल दिया
जयकुमार वैद्य का जीवन बचपन ही संघर्षों भरा रहा। उनके दादा-दादी ने एक दिन उनकी मां को घर से निकाल दिया। जिसके बाद उन्होंने अपने पति से तलाक लेने जैसा मुश्किल फैसला किया। जय और उनकी मां मुश्किलें यहीं पर खत्म वाली नहीं थी। ससुराल से निकालने के बाद वो अपने मां के घर में रहती थी, लेकिन अचानक मां के बीमार होने के बाद परिवार चलाने के लिए 2003 में उन्हें क्लर्क की नौकरी करनी पड़ी।
जयकुमार को स्कूल से निकालने पर एनजीओ ने दी मदद
जयकुमार के जीवन में एक दिन ऐसा भी आया जब समय से फीस नहीं दे पाने के कारण स्कूल ने उनको निकालने का फैसला किया। ऐसी विकट परिस्थिति में भी उनकी मां ने हिम्मत नहीं हारी। वो कई स्वमं सहायता समूह के पास मदद के लिए पहुंची। कई बार उन्हें मदद मिली, जबकि कई लोगों ने उनको सलाह दी कि अपने बेटे को ड्राइवर बना दो।
स्कूल से पिकनिक जाने के लिए नहीं होते थे पैसे
अपनी मंजिल की तरफ एक-एक सीढ़ी बढ़ते जा रहे जयकुमार ने बताया कि स्कूल जब सभी बच्चे पिकनिक के जाते थे तो मेरे लिए इसके लिए पैसे नहीं होते थे। पैसे की कमी की वजह से मैं दोस्तों के साथ खाने और घूमने नहीं जाता था। इतना सब कुछ करने के बाद महीने के अंत में अपने परिवार के पास कभी कभार ही 10 रुपये बचते थे। जय ने बताया कि जिस कालोनी हम रहते हैं, वहीं पर हमारे दूर के एक रिश्तेदार भी रहते थे, उन्होंने इतना बुरा वक्त होने के बावजूद कभी हमारी मदद नहीं की।
टीवी की मरम्मत करने वाली दुकान में काम करना पड़ा
जयकुमार को अपनी मां के साथ अपना घर चलाने के लिए एक टीवी की मरम्मत करने वाली दुकान में काम करना पड़ा। जो उसे 4000 रुपये महीने देता था। जब इन सबसे भी काम नहीं चला तो जय कुर्ला की एक दुकान में काम करने लगा। साथ आमदनी बढ़ाने के लिए वो दूसरे छात्रों के असाइनमेंट भी बनाता था।
उनकी वजह से मैंने अपने जीवन में कभी हार नहीं मानी
मां-बेटे के बीच की बॉडिंग को आप जय की इस बात से अच्छे से समझ सकते हैं। जय अपनी मां को अपने लिए सबसे बड़ा हीरो मानते हैं। उन्होंने कहा कि मेरी मां वो इंसान हैं, जिन्होंने अगले दिन जीने के लिए मुझे उत्साहित किया। मैं अपनी द्वारा किए का कर्ज नहीं उतार सकता हूं। उन्होंने हमेशा मेरा उत्साहवर्धन किया, मैं भी हमेशा उनके लिए ऐसा ही करता हूं। उनकी वजह से मैंने अपने जीवन में कभी हार नहीं मानी।
जयकुमार स्टापेंड के तौर पर 2000 डालर मिलते हैं
जयकुमार ने बातों ही बातों में ऐसी बात कही जिसे सुनकर आप चौक जाएंगे। उन्होंने कहा कि गरीबी और बुरे वक्त से बचने के लिए मैं घर से भाग जाना चाहता था, लेकिन मैं कभी भी अपनी मां को नहीं छोड़ पाया। वर्जीनिया की यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रहे जयकुमार स्टापेंड के तौर पर 2000 डालर मिलते हैं। जिसमें से वो हॉस्टल की फीस और जेब खर्चों में 500 डालर खर्च कर देते है। बाकी के बचे सारे पैसे वो अपनी मां के पास भेज देते हैं।
भारत प्रौद्योगिकी का आत्मनिर्भर हो और विनिर्माण केंद्र बने
जयकुमार बड़ा सोचते हैं उनका कहना है कि पीएचडी पूरी करने के बाद मुझे नौकरी मिल जाएगी। इसके बाद में भारत में कंपनी खोलना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि भारत प्रौद्योगिकी का आत्मनिर्भर हो और विनिर्माण केंद्र बने। उन्होंने आगे कहा कि मैं अपनी क्षमता को पूरा करने में छात्राओं और वंचित छात्रों की मदद करना चाहता हूं।
Published on:
02 Sept 2019 08:26 pm
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