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मोबाइल की दुनिया से दूर, शब्दों से बनाई अपनी पहचान: बिहार मूल की 14 वर्षीय मान्यता झा ने कम उम्र में प्रकाशित किया पहला उपन्यास

आज जब अधिकांश बच्चे मोबाइल और सोशल मीडिया की दुनिया में व्यस्त रहते हैं, ऐसे समय में मूल रूप से बिहार की रहने वाली 14 वर्षीय मान्यता झा ने अपनी रचनात्मक सोच और लेखन प्रतिभा से अलग पहचान बनाई है। कर्नाटक के विजयपुर में रहकर पढ़ाई कर रही कक्षा 10वीं की छात्रा मान्यता ने कम उम्र में अपना पहला उपन्यास द मिस्ट्री ऑफ द लॉस्ट बैग प्रकाशित कर सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है।

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मान्यता झा

मान्यता झा

15 कहानियां लिखकर बनीं प्रेरणा
उनकी लेखन यात्रा की शुरुआत कोविड महामारी के दौरान हुई। लॉकडाउन में स्कूल बंद होने के कारण मिले खाली समय में उन्होंने विशेष रूप से पौराणिक और मिथकीय पुस्तकों को पढऩा शुरू किया। इन कहानियों ने उनकी कल्पनाओं को नई दिशा दी और उनके भीतर खुद कुछ लिखने की इच्छा जागी। शुरुआत छोटी कहानियों से हुई। उनकी पहली कहानी ए वायरड रोड थी, जो रहस्य और रोमांच से जुड़ी थी। धीरे-धीरे यह रुचि गहरी होती गई और उन्होंने 15 लघु कथाएं लिख डालीं। परिवार और दोस्तों ने लगातार उनका उत्साह बढ़ाया। उनकी मां कहानियां पढ़कर सुझाव देती थीं, जिससे उनके लेखन में और निखार आता गया।

रेलवे अधिकारी की बेटी ने कोविड लॉकडाउन में शुरू किया लेखन सफर
विजयपुर के रेलवे कॉलोनी में रहने वाली मान्यता को अपने पहले उपन्यास का विचार भी अपने आसपास के माहौल से मिला। रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की आवाजाही और सामान को देखकर उनके मन में एक कहानी ने आकार लेना शुरू किया। एक लड़की के बैग खोने और उसे तलाशने की कल्पना आगे चलकर उनके उपन्यास की मुख्य कहानी बन गई। मान्यता के पिता चंदन कुमार झा रेलवे विभाग में सहायक मंडल अभियंता के पद पर विजयपुर में कार्यरत हैं। परिवार में शिक्षा और पढऩे-लिखने का माहौल होने के कारण बचपन से ही मान्यता की रुचि पुस्तकों और लेखन की ओर बढ़ती गई। यही रुचि आगे चलकर उनकी पहचान का आधार बनी।

मोबाइल की बढ़ती लत से सावधान रहने का संदेश
मान्यता की कहानियों में लड़कियों के संघर्ष, आत्मविश्वास और आगे बढऩे की प्रेरणा दिखाई देती है। वे मानती हैं कि लड़कियां हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित कर सकती हैं। इसके साथ ही उन्होंने बच्चों और युवाओं को मोबाइल की बढ़ती लत से सावधान रहने का संदेश भी दिया है। उनका मानना है कि मोबाइल केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सीखने और ज्ञान बढ़ाने का माध्यम भी होना चाहिए। कम उम्र में मान्यता झा की यह उपलब्धि यह साबित करती है कि यदि बच्चों को सही दिशा, परिवार का सहयोग और अपनी रुचि को आगे बढ़ाने का अवसर मिले तो वे छोटी उम्र में भी बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं।