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खादी के तिरंगे की मांग लगातार घटी: जिस हाथों से बनता है तिरंगा, उन्हीं हाथों में अब काम कम

देश की शान और स्वदेशी परंपरा का प्रतीक खादी अब तिरंगे के बाजार में लगातार पिछड़ रही है। कर्नाटक के हुब्बल्ली स्थित बेंगेरी के कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संयुक्त संघ (केकेजीएसएसएफ) में बनने वाले खादी के तिरंगे की मांग साल-दर-साल घट रही है। 2022-23 में 4.28 करोड़ रुपए का कारोबार करने वाली इस इकाई की बिक्री 2024-25 में घटकर 1.80 करोड़ रुपए रह गई। चालू वित्त वर्ष में 7 अगस्त तक महज 63 लाख रुपए के तिरंगे बिके हैं। संघ को इस वर्ष 2 करोड़ रुपए के कारोबार की उम्मीद थी। बेंगेरी का खादी संघ देश में राष्ट्रध्वज के निर्माण और आपूर्ति का एकमात्र अधिकृत केंद्र है। यहां बने तिरंगे लाल किले की प्राचीर से लेकर देशभर के सरकारी संस्थानों और विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों तक फहराए जाते हैं। इसके बावजूद खादी के तिरंगे की मांग में लगातार कमी इस पारंपरिक उद्योग के लिए चिंता का विषय बन गई है।
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महिलाओं के हाथों आकार लेता तिरंगा: बेंगेरी की खादी इकाई में तिरंगे की सिलाई करती महिला कर्मचारी। यहां करीब 25 महिलाएं राष्ट्रध्वज तैयार करने के विभिन्न चरणों में काम करती हैं।

महिलाओं के हाथों आकार लेता तिरंगा: बेंगेरी की खादी इकाई में तिरंगे की सिलाई करती महिला कर्मचारी। यहां करीब 25 महिलाएं राष्ट्रध्वज तैयार करने के विभिन्न चरणों में काम करती हैं।

रिकॉर्ड बिक्री के बाद लगातार गिरावट
संघ के आंकड़ों के मुताबिक 2020-21 में 16,290 तिरंगे बिके और 1.15 करोड़ रुपए का कारोबार हुआ था। 2021-22 में बिक्री बढ़कर 20,171 झंडे और कारोबार 2.50 करोड़ रुपए हो गया। 2022-23 में हर घर तिरंगा अभियान के दौरान 28,850 झंडे बिके और कारोबार रिकॉर्ड 4.28 करोड़ रुपए पहुंच गया। इसके बाद बिक्री में लगातार गिरावट आई। 2023-24 में 18,614 झंडे बिके और कारोबार 2.26 करोड़ रुपए रह गया। 2024-25 में बिक्री घटकर 12,922 झंडे और कारोबार 1.80 करोड़ रुपए रह गया। इस साल 7 अगस्त तक बिक्री सिर्फ 63 लाख रुपए हुई है। यानी रिकॉर्ड वर्ष के मुकाबले खादी के तिरंगे की बिक्री में भारी गिरावट दर्ज हुई है।

सस्ता पॉलिएस्टर, महंगी खादी
केकेजीएसएसएफ के सचिव शिवानंद मठपति के अनुसार, 2022 में ध्वज संहिता में संशोधन के बाद मशीन से बने पॉलिएस्टर के झंडों के इस्तेमाल की अनुमति मिलने से खादी के तिरंगे की मांग प्रभावित हुई है। खादी का झंडा हाथ से तैयार होता है, इसलिए इसमें अधिक श्रम और लागत लगती है। इसके मुकाबले पॉलिएस्टर के झंडे सस्ते पड़ते हैं और बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं। मठपति के अनुसार, जून-जुलाई में जम्मू-कश्मीर, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कोलकाता समेत कई राज्यों से खादी के तिरंगे के बड़े ऑर्डर आते थे। इस बार मांग काफी कम है। बिक्री घटने से तैयार झंडों का स्टॉक भी जमा हो रहा है।

बालाकोट से बेंगेरी तक छह चरणों में तैयार होता है तिरंगा
राष्ट्रध्वज के लिए खादी का कपड़ा बालाकोट के तुलसीगेरी गांव में तैयार किया जाता है। हाथ से कताई और बुनाई के बाद कपड़े की रंगाई, अशोक चक्र की प्रिंटिंग, सिलाई और बंधाई की प्रक्रिया बेंगेरी में पूरी होती है। हर तिरंगा बीआईएस के निर्धारित मानकों के अनुसार तैयार किया जाता है। कपड़े की गुणवत्ता, रंग, धागे की मजबूती, आकार और अनुपात में पूरी सटीकता रखनी होती है। राष्ट्रध्वज का अनुपात 3:2 निर्धारित है। बेंगेरी में अलग-अलग जरूरतों के लिए नौ आकार के तिरंगे तैयार किए जाते हैं। इनकी कीमत आकार के अनुसार करीब 250 रुपए से लेकर 30 हजार रुपए तक है। बड़े आकार के झंडे हाईमास्ट और विभिन्न सार्वजनिक स्थलों पर लगाए जाते हैं।

हर चरण में महिलाओं के हाथ
प्रोडक्शन प्रभारी निर्मला इलकल ने बताया कि तिरंगा तैयार करने की प्रक्रिया में प्रिंटिंग, सिलाई और आयरन से लेकर अन्य कामों में महिलाएं ही प्रमुख रूप से लगी हैं। इकाई में करीब 25 महिलाएं कार्यरत हैं। इनके हाथों से तिरंगे का हर हिस्सा तैयार होकर राष्ट्रध्वज का रूप लेता है।

असर महिला कामगारों पर
तिरंगा तैयार करने की प्रक्रिया में लगी एक अन्य महिला के अनुसार, घटती मांग का असर महिला कामगारों पर भी पड़ रहा है। बिक्री कम होने के कारण काम घटा है और तैयार झंडों का स्टॉक बढ़ रहा है।