
तेलंगाना के लिए विहार करते आचार्य विमलसागरसूरीश्वर।
आहार का सीधा प्रभाव मन और जीवन पर
आचार्य ने कहा कि आहार का सीधा प्रभाव मन और जीवन पर पड़ता है। जीव अनेक चीजों के बिना रह सकता है, लेकिन आहार के बिना नहीं। इसलिए यह विचार करना आवश्यक है कि मनुष्य का आहार कैसा होना चाहिए। जैन, बौद्ध और वैदिक परंपराओं के शास्त्र शाकाहार को श्रेष्ठ बताते हैं। इतिहास गवाह है कि शक्तिशाली और सात्विक जीवन जीने वाले लोग अल्प आहार में भी जीवनयापन कर लेते हैं, लेकिन वे किसी भी परिस्थिति में मांसाहार का सेवन नहीं करते। उन्होंने कहा कि भगवान कभी मांसाहार नहीं करते और न ही उसका समर्थन करते हैं। उनका संदेश अहिंसा, दया और करुणा पर आधारित है। यही कारण है कि शाकाहार को मानव संस्कृति का अभिन्न अंग माना गया है। शाकाहार केवल भोजन पद्धति नहीं, बल्कि जीवन के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण है।
मांसाहार बढ़ा तो बढ़ेंगे संकट
आचार्य विमलसागरसूरीश्वर ने कहा कि हिंसा और मांसाहार की मानसिकता ही युद्ध, विनाश और अशांति को जन्म देती है। इसके विपरीत अहिंसा और शाकाहार सुख, शांति, स्वास्थ्य, स्वच्छता और मानवता का संदेश देते हैं। शाकाहार को किसी धर्म या संप्रदाय से जोड़कर नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे जीवन मूल्यों और प्रकृति संरक्षण के दृष्टिकोण से समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि हवा, पानी, वनस्पति, पृथ्वी और समस्त जीव-जंतु एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। प्रकृति की किसी भी कड़ी को नष्ट करना अंतत: मानव जीवन के लिए भी संकट पैदा करता है। आज अनेक जीव प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं और पर्यावरणीय संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। यह सब हिंसक मानसिकता और असीमित उपभोग का परिणाम है।
Published on:
25 Jun 2026 05:04 pm
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