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डिजिटल युग में नई पहचान गढ़ने की चुनौती से जूझता रेडियो

हर वर्ष 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया जाता है, ताकि इस माध्यम की ऐतिहासिक भूमिका और समाज पर उसके प्रभाव को याद किया जा सके। एक समय था जब समाचार, संगीत, नाटक, खेल प्रसारण और सरकारी सूचनाओं का सबसे भरोसेमंद साधन रेडियो ही हुआ करता था। घर-घर में रेडियो की आवाज गूंजती थी […]

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हर वर्ष 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया जाता है

हर वर्ष 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया जाता है

हर वर्ष 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया जाता है, ताकि इस माध्यम की ऐतिहासिक भूमिका और समाज पर उसके प्रभाव को याद किया जा सके। एक समय था जब समाचार, संगीत, नाटक, खेल प्रसारण और सरकारी सूचनाओं का सबसे भरोसेमंद साधन रेडियो ही हुआ करता था। घर-घर में रेडियो की आवाज गूंजती थी और परिवार एक साथ बैठकर कार्यक्रम सुना करते थे। लेकिन तकनीक के तेज विकास और डिजिटलीकरण के साथ मीडिया का स्वरूप तेजी से बदल गया। टेलीविजन चैनलों की भरमार, इंटरनेट आधारित समाचार प्लेटफॉर्म, यूट्यूब और सोशल मीडिया ने सूचना और मनोरंजन के नए विकल्प उपलब्ध करा दिए। ऐसे में रेडियो धीरे-धीरे मुख्यधारा से दूर होता गया।

मोबाइल फोन ने ली जगह
बाजार की स्थिति भी इस बदलाव को दर्शाती है। आज दुकानों में पारंपरिक रेडियो सेट बहुत कम दिखाई देते हैं, क्योंकि मोबाइल फोन ने उसकी जगह ले ली है। अब लोग अलग से रेडियो खरीदने के बजाय मोबाइल ऐप या एफएम सुविधा का उपयोग कर लेते हैं। इससे रेडियो का स्वरूप तो बचा रहा, लेकिन उसकी पहचान बदल गई। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि रेडियो पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुआ है। आपदा, प्राकृतिक संकट या दूरदराज के क्षेत्रों में आज भी रेडियो सबसे सुलभ और कम लागत वाला माध्यम साबित होता है। सामुदायिक रेडियो स्टेशन ग्रामीण इलाकों में स्थानीय भाषा और मुद्दों को आवाज देने का काम कर रहे हैं।

आधुनिक तकनीक के साथ ढालने की चुनौती
निजी एफएम चैनलों ने भी युवाओं को जोडऩे की कोशिश की, लेकिन डिजिटल मनोरंजन के मुकाबले वह प्रभाव स्थायी रूप से नहीं बना सके। अब चुनौती यह है कि रेडियो आधुनिक तकनीक के साथ खुद को कैसे ढाले। पॉडकास्ट, ऑनलाइन रेडियो और डिजिटल स्ट्रीमिंग इसके नए रूप बनकर उभर रहे हैं। विश्व रेडियो दिवस ऐसे समय में मनाया जा रहा है, जब यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या रेडियो केवल इतिहास का हिस्सा बनकर रह जाएगा, या नई तकनीक के सहारे फिर से अपनी जगह बनाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रेडियो अपनी विश्वसनीयता और सरलता को आधुनिक मंचों के साथ जोड़ ले, तो उसकी आवाज अभी लंबे समय तक सुनाई देती रहेगी।

आज भी श्रोताओं के दिलों से जुड़ा हुआ है रेडियो
हुब्बल्ली प्रवासी राजस्थान के गोलिया चौधरियान निवासी बिजनेसमैन किशोर पटेल कहते हैं, डिजिटल दौर में भले ही मनोरंजन के कई नए माध्यम सामने आ गए हों, लेकिन एफएम रेडियो आज भी श्रोताओं के दिलों से जुड़ा हुआ है। विशेषकर प्रेरणादायक और जीवन से जुड़े प्रसंगों पर आधारित कार्यक्रम लोगों को सकारात्मक सोच की ओर प्रेरित करते हैं। श्रोता आज भी ऐसे कार्यक्रमों को बड़ी रुचि से सुनते हैं। लोकप्रिय रेडियो प्रस्तोता आर.जे. कार्तिक जैसे आरजे अपनी संवेदनशील कहानियों और जीवन से जुड़े अनुभवों के माध्यम से श्रोताओं के मन को छूते हैं और रोजमर्रा की भागदौड़ में एक सकारात्मक विराम देने का काम करते हैं।