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उत्तर कर्नाटक में अनूठी मिसाल बना राजस्थानी हिंदी विद्यालय, पीढिय़ों से संजो रहा भाषा और संस्कारों की विरासत

अंग्रेजी माध्यम और डिजिटल शिक्षा के बढ़ते प्रभाव के दौर में जहां हिंदी माध्यम के विद्यालयों की संख्या लगातार घटती जा रही है, वहीं हुब्बल्ली का शांतिनाथ हिंदी हाई स्कूल एवं राजस्थानी हिंदी विद्यालय आज भी हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और संस्कारों की ज्योति को प्रज्ज्वलित किए हुए है। श्री जैन राजस्थानी विद्या प्रचारक मंडल (एसजेआरवीपी मंडल) के अधीन संचालित यह संस्थान उत्तर कर्नाटक में हिंदी शिक्षा का एक अनूठा केंद्र बनकर उभरा है और पिछले साढ़े छह दशक से शिक्षा सेवा में निरंतर योगदान दे रहा है।
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हुब्बल्ली का शांतिनिकेतन परिसर, जहां हिंदी विद्यालय सहित पांच शिक्षण संस्थान संचालित हो रहे हैं और पिछले साढ़े छह दशक से शिक्षा एवं संस्कारों की अलख जलाई जा रही है।

हुब्बल्ली का शांतिनिकेतन परिसर, जहां हिंदी विद्यालय सहित पांच शिक्षण संस्थान संचालित हो रहे हैं और पिछले साढ़े छह दशक से शिक्षा एवं संस्कारों की अलख जलाई जा रही है।

हिंदी शिक्षा और संस्कारों की मशाल
आज जब शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, तब शांतिनाथ हिंदी हाई स्कूल एवं राजस्थानी हिंदी विद्यालय यह साबित कर रहा है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, पहचान और मूल्यों की वाहक भी होती है। साढ़े छह दशक बाद भी यह संस्थान हिंदी शिक्षा और संस्कारों की मशाल को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहा है।

कुछ विद्यार्थियों से शुरू हुआ सफर
विद्यालय की स्थापना का उद्देश्य राजस्थान और हिंदीभाषी परिवारों के बच्चों को मातृभाषा में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना था। शुरुआती वर्षों में विद्यालय का संचालन मंगलवारपेठ, घंटीकेरी, जवली साल और बंकापुर चौक क्षेत्र के विभिन्न भवनों में किया गया। उस समय सीमित संसाधनों और चुनौतियों के बीच समाज के लोगों ने शिक्षा की इस अलख को जीवित रखा। विद्यालय में प्रारंभ में मात्र 10 से 15 विद्यार्थी अध्ययन करते थे, लेकिन शिक्षा के प्रति समाज की जागरूकता और संस्थान की गुणवत्ता के कारण विद्यार्थियों की संख्या लगातार बढ़ती गई। धीरे-धीरे यह विद्यालय उत्तर कर्नाटक में हिंदी शिक्षा के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित हो गया।

समाज के सहयोग से बना स्थायी परिसर
वर्ष 1988-89 में समाज के सामूहिक प्रयासों और दानदाताओं के सहयोग से भूमि खरीदकर विद्यालय के वर्तमान भवन का निर्माण किया गया। आज शांतिनिकेतन परिसर में हिंदी विद्यालय सहित पांच शिक्षण संस्थानों का संचालन किया जा रहा है। यह परिसर हजारों विद्यार्थियों के भविष्य निर्माण और संस्कार शिक्षा का साक्षी बना हुआ है।

शिक्षा के साथ संस्कारों का संगम
संस्थान केवल पाठ्यक्रम आधारित शिक्षा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विद्यार्थियों में भारतीय संस्कृति, सामाजिक मूल्यों और नैतिकता के संस्कार भी विकसित करता रहा है। यही कारण है कि यहां से शिक्षा प्राप्त करने वाले अनेक विद्यार्थी विभिन्न क्षेत्रों में सफलता हासिल कर समाज में अपनी पहचान बना चुके हैं।

हिंदी भाषा संरक्षण में अहम भूमिका
बदलते समय में हिंदी माध्यम के विद्यालयों के सामने अनेक चुनौतियां आईं, लेकिन संस्थान ने अपने मूल उद्देश्य से कभी समझौता नहीं किया। आज भी यहां हिंदी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। नई पीढ़ी को मातृभाषा से जोडऩे और भारतीय संस्कृति से परिचित कराने में विद्यालय की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है।

शिक्षा और संस्कारों की परंपरा जारी रहेगी
श्री जैन राजस्थानी विद्या प्रचारक मंडल के अध्यक्ष भवरलाल सी. जैन लक्की ने कहा कि विद्यालय ने अपने लंबे सफर में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन समाज के सहयोग और समर्पण से यह संस्था निरंतर आगे बढ़ रही है। वर्तमान में मंडल के अधीन पांच शिक्षण संस्थानों का संचालन किया जा रहा है और शिक्षा तथा संस्कारों की यह परंपरा भविष्य में भी जारी रहेगी।

आसान नहीं था हिंदी विद्यालय का संचालन
वहीं वरिष्ठ समाजसेवी एवं विद्यालय से लंबे समय तक जुड़े रहे घीसूलाल कटारिया ने बताया कि पुराने समय में हिंदी विद्यालय का संचालन आसान नहीं था। राजस्थान और हिंदीभाषी परिवारों के बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा मिले, इसी उद्देश्य से इसकी स्थापना की गई थी। समाज के सहयोग और शिक्षाप्रेम के कारण यह संस्थान आज भी मजबूती से खड़ा है।

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