5 अप्रैल 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बचपन से ही हो संस्कारों का बीजारोपण, बच्चों को संस्कारित करने में परिवार के बड़े सदस्यों की अहम भूमिका

15 दिवसीय श्रीमद्भागवत, राम कथा एवं नानी बाई रो मायरो का समापन कथा के अंतिम दिन कथावाचक पुष्करदास ने संस्कारों पर दिया बल

2 min read
Google source verification
हुब्बल्ली के गब्बुर गली स्थित रामदेव मंदिर परिसर में बुधवार को कथा श्रवण कराते कथावाचक पुष्करदास एवं कथा श्रवण करती महिलाएं।

हुब्बल्ली के गब्बुर गली स्थित रामदेव मंदिर परिसर में बुधवार को कथा श्रवण कराते कथावाचक पुष्करदास एवं कथा श्रवण करती महिलाएं।

यदि आरंभ से ही बच्चों को अच्छे संस्कार मिले तो उनमें सद्गुणों का विकास होता है और वह अपनी संस्कृति और परिवार से जुड़ता है। अच्छे संस्कार जीवन को उचित दिशा देते हैं। बच्चों में शिक्षा के साथ ही संस्कारों का बीजारोपण होना चाहिए। संस्कारों के बिना शिक्षा अधूरी है। बच्चों को सुसंस्कारित करना परिवार के बड़े सदस्यों की जिम्मेदारी है, साथ ही समाज के प्रतिष्ठित लोगों का कर्तव्य है।
राजस्थान के उदयपुर से आए कथावाचक पुष्करदास ने यह बात कही। वे यहां हुब्बल्ली (कर्नाटक) के गब्बुर गली स्थित श्री रामदेव मंदिर परिसर में कथा श्रवण करा रहे थे। 15 दिवसीय श्रीमद्भागवत, राम कथा एवं नानी बाई रो मायरो का बुधवार को समापन हुआ। रामदेव मरुधर सेवा संघ हुब्बल्ली के तत्वावधान में आयोजित कथा के दौरान कथावाचक पुष्करदास ने कहा, शिक्षा से पहले संस्कार की आवश्यकता है। बच्चों को घर से ही संस्कार देना शुरू कीजिए। बच्चे के बड़े होने पर संस्कार देना मुश्किल हो जाता है इसलिए बाल्यावस्था से ही संस्कार का बीज बोना आवश्यक है।

बच्चों को प्रभावित करते हैं संस्कार
संस्कारों से ही दया, करुणा, प्रेम, परोपकार आदि से स्वयं का जीवन सजाने वाला व्यक्ति महान बन जाता है। जबकि जीवन में यदि संस्कार और मर्यादा नहीं है तो व्यक्ति का पतन निश्चित है। परिवार और माता-पिता के संस्कार बच्चों को प्रभावित करते हैं। परिवार में नियम की तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी जो संस्कार बच्चों तक पहुंचते हैं उसका गहरा प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर पड़ता है। बड़ों के पैर छूना, सिर झुकाकर प्रणाम, प्रात: जल्दी उठना, गरीबों की मदद करना, घर के बुजुर्गो की सेवा करना आदि संस्कार हमें अपने परिवार से ही मिलते हैं। बच्चों में नैतिक शिक्षा देने का काम हो।

जीवन भर साथ रहते हैं अच्छे संस्कार
कथावाचक पुष्करदास ने कहा, आज के इस बदलते परिवेश में समय निकालकर बच्चों को संस्कारवान बनाना यज्ञ करने के समान है। आदर्श समाज की स्थापना संस्कार से ही शुरू हो सकती है और संस्कार जन्म से ही डाला जा सकता है। अच्छे संस्कार जीवन को उचित दिशा देते हैं। बाल्यावस्था में अनुशासन के संस्कार का बीजारोपण होना आवश्यक है। अगर बचपन में बच्चों को अच्छे संस्कार दिए गए तो वह पूरे जीवन उसके साथ रहते हैं और चाहकर भी गलत काम नहीं कर पाता।

संस्कार से बनते हैं स्वावलम्बी
खिलौने और किताबें व्यवस्थित ढंग से निश्चित स्थान पर रखना सरीखे संस्कार बच्चों को व्यवस्थित और स्वावलंबी बनाते हैं। माता-पिता को अपने कार्य व्यवहार से ऐसे संस्कार भी बच्चों में डालना चाहिए, जिससे वह समय के महत्व को समझे। बच्चों में अच्छे संस्कार विकसित करना शिक्षा का आवश्यक अंग है। अच्छे मन का संवर्धन शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए। यह तभी संभव है जब मां-पिता और शिक्षक के कार्य व्यवहार में वे संस्कार दिखें।

कथा के बीच भजनों की मनमोहक प्रस्तुति
श्री राधे गोविंद भज मन श्रीराधे…समेत अन्य मनभावन भजनों की प्रस्तुति पर श्रोता झूमने पर मजबूर हो गए। कथा के दौरान बीच-बीच में भजनों की प्रस्तुति पर श्रोतागण भी भाव-विभोर होकर नाचने लगे। कथा के अंतिम दिन कथा सुनने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। कथा स्थल भगवान के जयकारों से गुंजायमान हो गया।

विभिन्न स्थानों से शामिल हुए भक्तगण
श्री रामदेव मरुधर सेवा संघ हुब्बल्ली के केसाराम चौधरी ने बताया कि बुधवार को भक्तों की ओर से प्रभावना रखी गई एवं आरती की गई। संघ के अध्यक्ष उदाराम प्रजापत एवं सचिव मालाराम देवासी ने बताया कि बुधवार को कथा की पूर्णाहूति हुई। शहर के विभिन्न इलाकों से प्रवासी कथा में शामिल हुए।