
अजब-गजब : अपनी जमीन अपना बताने में लग गए 11 साल
इंदौर। ११ साल पहले जमीनों को दस्तावेज से कम्प्यूटर पर चढ़ाकर ऑनलाइन किया जा रहा था। उस समय एक शख्स की निजी जमीन को खेड़ापति हनुमान मंदिर की संपत्ति के रूप में दर्ज कर दिया गया। जैसे ही खसरा नकल हाथ में आई, वैसे ही परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई। लगातार संघर्ष के बाद अब जाकर सुनवाई हुई और जमीन निजी नाम से करने का आदेश जारी किया गया।
सरकार के पास कुछ जमा हो जाए तो उससे वापस लेने में ऐड़ी-चोटी का जोर लग जाता है। ऐसा ही कुछ पिगडम्बर के रमेशचंद्र पिता कन्हैयालाल ठाकुर के साथ हुआ। पिगडम्बर में सर्वे नंबर 195 की जमीन उनकी निजी थी, जिस पर काफी समय से वे खेती करते आ रहे थे। एक दशक पहले जब उन्होंने खसरा नकल निकाली तो ये जमीन खिसक गई।
उनकी निजी जमीन पर श्री खेड़ापति मंदिर व्यवस्थापक कलेक्टर का नाम दर्ज हो गया। ताबड़तोड़ भू-राजस्व संहिता की धारा 115-16 के तहत आवेदन पेश किया ताकि रिकॉर्ड (इंद्राज) दुरुस्त हो सके पर काम आसान नहीं था। क्योंकि राजस्व रिकॉर्ड में जमीन सरकारी हो चुकी थी। ऊपर से मंदिर के नाम पर, ऐसे में काम इतनी आसानी से नहीं हो सकता था। पूर्व में उन्हें टाल भी दिया गया।
सामने आया एक ओर पेंच
जांच प्रतिवेदन में ये बात सामने आई कि वर्तमान रिकॉर्ड में पिगडम्बर सर्वे नंबर 195 की जमीन वास्तविकता में 0.324 हेक्टेयर है लेकिन राजस्व के रिकॉर्ड में वर्तमान में 1.016 हेक्टेयर आ रही है, जो कि 0.692 हेक्टेयर अधिक है। खसरा रिकॉर्ड में जमीन श्री खेड़ापति मंदिर व्यवस्थापक के नाम पर दर्ज है। ये किस आधार पर दर्ज हुआ है, जिसका कॉम नंबर 12 में कोई आदेश दर्ज नहीं है। जमीन सर्वे नंबर 195 0.324 हेक्टेयर की 1925-26 से लेकर 2011-12 तक हस्तालिखित खसरों में निजी भूमि के रूप में दर्ज थी।
किसान ने ऋण पुस्तिका, खसरा, नक्शा पेश की रिपोर्ट पेश की। वहीं, मिसल बंदोबस्त की जांच में सर्वे नंबर 195 की 0.80 मिसल बंदोबस्त में विनायकराव, कृष्णाराव के नाम पर दर्ज पाई गई। वर्ष 2011-12 के हस्तलिखित खसरा अभिलेखों में भी निजी नाम पर दर्ज था। बाद में कम्प्यूटर खसरा अभिलेख में गलती से बिना किसी आदेश के जमीन श्री खेड़ापति मदिर व्यवस्थापक कलेक्टर देव स्थान के नाम पर दर्ज हो गई।
रिपोर्ट में हो गया खुलासा
काफी समय परिवार के परेशान होने के बाद मामला एसडीओ प्रतुल्ल सिन्हा के पास पहुंचा। उन्होंने नायब तहसीलदार को मामले की जांच कर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए। नायब तहसीलदार ने पटवारी से रिपोर्ट मांगी। रिपोर्ट में खुलासा हो गया कि 1925 के मिसल बंदोबस्त के रिकॉर्ड में जमीन निजी दर्ज थी। उसके आधार पर अब एसडीओ सिन्हा ने जमीन को सरकारी से निजी करने का आदेश जारी कर दिया।
बकायदा प्रकरण कलेक्टर मनीष सिंह की अदालत तक भेजा गया क्योंकि सरकारी जमीन को कम्प्यूटर के सरकारी रिकॉर्ड में निजी करने का अधिकार सिर्फ उनके पास है। 11 साल संघर्ष के बाद किसान को उसकी जमीन मिलेगी। बड़ी बात ये है कि वर्तमान में जमीन करोड़ों रुपए की हो गई है।
Published on:
16 Nov 2022 11:18 am
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