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ना दास्तां रहीं, ना किस्सागोई और ना कुछ कहने सुनने को

गांधी और कबीर को उर्दू जुबां में सुनाने वाले अंकित चड्डा छोड़े गए खामोशी का जहां

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इंदौर . कबीर और गांधी को किस्सागोई में पिरोने वाले युवा दास्तानगो अंकित चड्ढा की 30 वर्ष की आयु में हजार लफ्जों के साथ दुनिया को अलविदा कह गए। पुणे में झील में डूबने से उनकी मौत हो गई। दिल्ली के लोधी रोड स्थित शवदाह गृह में शुक्रवार को अंतिम संस्कार हुआ। अंकित को दास्तान कहने के अपने हुनर में इस कदर महारत हासिल थी कि वह अपने अल्फाज ओ अंदाज से सामने बैठे लोगों को बांध लेते थे। चड्ढा का कार्यक्रम ‘दास्तां ढाई आखर की’ 12 मई को पुणे के ज्ञान अदब केंद्र पर होना था। मध्यमवर्गीय पंजाबी परिवार में जन्मे चड्ढा की दास्तांगोई में कबीर के अलावा दाराशिकोह, अमीर खुसरो और रहीम का जिक्र तो था ही महात्मा गांधी के जीवन को लेकर उनकी बुनी कहानी को देश-विदेश में पसंद किया गया।
कबीर को समझने का नजरिया बदला
होमर रचित इलियाड नामक महाकाव्य में एक दृश्य आता है जब एक बुरा आदमी (खूंखार डकैत ) गिरजाघर में एक युवा गायक पादरी के सामने अपने हथियार फेंक देता है यह कहकर कि कलाकार, गायक को जिंदा रहना चाहिए। वह उस गायक को अपनी शेष उम्र भेंट में देता है और अपनी इहलीला समाप्त कर लेता है। सारी जनता स्तब्ध है और गायक गा रहा है। इस तरह कलाकार और अच्छे गायकों के लिए सम्मान बना और परम्पराओं और विश्व की कमोबेश हर सभ्यता में यह बचा हुआ है।
आज यह प्रसंग याद आया, जब कबीर पर अंकित चड्डा की दास्तान गोई सुनी, रोक नही पा रहा अपने को यह कहने से इस बन्दे में जो करिश्मा है वह अप्रतिम और अदभुत हैं। अंकित ने अपनी अभिव्यक्ति से कबीर को समझने का मेरा नजरिया बदल दिया। अब यही लगता है कि शायद खुदा को भी अच्छे अफसानानिगार की जरूरत है, शायद मंटो की कब्र पर यह खुदा हुआ है, तुम ऐसे कैसे जा सकते हो
क्या तुम्हें याद नही अमेरिका जाने से पहले तुमने वादा किया था कि दिल्ली में हम मिलेंगे और फिर देवास आओगे, मेरे घर दो चार दिन रहोगे।
तुम तो दास्तान सुनाते थे - तुम्ही चले गए, अब ना दास्तान रही - ना किस्सागोई और ना कुछ कहने सुनने को
अंकित तुमने आज एक स्थाई दुख दे दिया है, बस इतना कि कल कबीर ने भी अपना असली वंशज खो दिया है और हम सब पुन: अनाथ हो गए हैं। विदा अंकित , तुम सदैव मेरे दिल मे एक श्रेष्ठ इंसान और बेहतरीन कलाकार के रूप में जिंदा रहोगे। अपने लाखों प्रशंसकों के दिलों में भी।