
Asha Bhosle Recounts Her Tale of Struggle in Indore
Asha Bhosle- इंदौर की रातें, सराफा की रौनक और अपनत्व से भरे रिश्ते, ये सब आशा भोसले की यादों का हिस्सा रहे हैं। जब उन्होंने सानंद न्यास के एक कार्यक्रम में मंच से कहा 'हम शापित गंधर्व हैं', तो यह सिर्फ एक कलाकार की पीड़ा नहीं, बल्कि उस इंसान का सच था जो दूसरों को खुशी देता है, पर अपने दर्द को छिपाए रखता है। इंदौर से उनका रिश्ता बचपन की यादें, पारिवारिक जुड़ाव और शहर के स्वाद में रचा-बसा था। आशा भोसले को यहां का भोजन बहुत पसंद था। आमतौर पर गायक-गायिकाएं अपने खान-पान को लेकर बहुत सतर्कता बरतते हैं लेकिन वे कुछ अलग थीं। जब भी इंदौर आतीं तो सराफा में व्यंजनों का स्वाद लेने से नहीं चूकतीं थीं। आशा भोसले को यह शहर उनके और परिवार के संघर्ष की भी याद दिलाता था। हाल ये था कि उन दिनों एक रिश्तेदार के घर एक टाइम का भोजन कर गुजारा किया था।
कहती थीं-सराफा के खाने जैसा आनंद कहीं नहीं
सानंद न्यास के अध्यक्ष जयंत भिसे बताते हैं कि आशाजी को इंदौर से खास लगाव था। वे जब इंदौर आतीं तो अपने भाई-बहनों के साथ छावनी में मौसी के यहां रुकती थीं। रात होते ही उनका मन सराफा जाने का करता था। वे 3 मार्च 2013 को सानंद के एक कार्यक्रम में आई थीं। तब रात 1 या 1.30 बजे उनका कहना था कि सराफा ले चलो, वहां जाकर खाने का जो आनंद मिलता है, वह कहीं और नहीं।
आमतौर पर गायक-गायिकाएं अपने खान-पान को लेकर सतर्क रहते हैं, लेकिन आशा इस मामले में अलग थीं। जब वे लता अलंकरण पुरस्कार लेने इंदौर आईं तब भी उन्होंने सराफा में व्यंजनों का स्वाद लिया।
आशाजी को खाना बनाने और खिलाने का भी बहुत शौक था
मनोज बिनीवाले आशा भोसले के रिश्तेदार हैं और बचपन में साथ भी रहे। वे बताते हैं कि आशाजी को खाना बनाने और खिलाने का बहुत शौक था। वे जब भी इंदौर आती थीं तो खाना बनाकर खिलाती थीं।
संघर्ष के दिनों को आशा भोसले कभी नहीं भूलीं। मनोज बिनीवाले बताते हैं, गर्दिश के उस दौर की याद करते हुए आशाजी कहती थीं कि दीदी (लताजी) और उनके परिवार के पास एक वक्त के भोजन की भी व्यवस्था नहीं थी। तब रिश्तेदार गवाणे साहब के घर एक टाइम का भोजन ऐसे समय करते कि दोनों वक्त का काम हो जाए।
Published on:
13 Apr 2026 08:24 am
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