
इंदौर. जिला प्रशासन सरकारी जमीनों पर कब्जा करने वाले, अवैध कॉलोनी बसाने वालों पर कार्रवाई की तैयारी कर रहा है। लेकिन, हर बार साल की शुरुआत में इसी तरह का अभियान शुरू होने के बाद भी अवैध कॉलोनियों पर रोक नहीं लग पा रही है। लगातार अवैध कॉलोनियां बसती जा रही हैं। इसका मुख्य कारण अवैध कॉलोनी बसाने वालों पर किसी तरह की कार्रवाई नहीं होना है।
नगर निगम में ही 900 से ज्यादा अवैध कॉलोनियां दर्ज हैं। इनमें से कई ऐसी हैं, जिनमें से निगम ने पिछले दिनों 225 को नियमित करने के लिए काम शुरू किया था। इन कॉलोनियों की जानकारी जुटाने के दौरान निगम ने इन्हें बसाने वालों की भी जानकारी जुटाई थी। इस दौरान लगभग 200 से ज्यादा अवैध कॉलोनाइजर्स की सूची तैयार कर अलग-अलग थानों में शिकायत की गई थी। लेकिन, इनमें से एक पर भी एफआइआर दर्ज नहीं हुई।
10 साल की सजा का है प्रावधान
मप्र नगर पालिक निगम अधिनियम 1956 की धारा 292 के तहत अवैध कॉलोनी बसाना गंभीर अपराध की श्रेणी में है। इसे बसाने वालों को 10 साल की सजा और अर्थदंड की सजा का प्रावधान है। इससे अवैध कॉलोनी बसने देने वाले अफसरों को भी 7 साल की सजा का प्रावधान किया गया है।
नेताओं के रिश्तेदार जिम्मेदार हैं अवैध कॉलोनाइजर्स
इंदौर में अवैध कॉलोनी काटने वाले 200 से ज्यादा कॉलोनाइजर्स में कई नेता और उनके रिश्तेदारों के नाम शामिल हैं। इनमें संपत एवेन्यू, संपत फॉर्म, यशोदा नगर, केदार नगर, परमहंस नगर, भवानी नगर, नंदबाग, मारवाड़ी अग्रवाल नगर कॉलोनियां शामिल हैं। इनमें संपत एवेन्यू, संपत फॉर्म आदि कॉलोनियों में विधायक विशाल पटेल के रिश्तेदारों के नाम अवैध कॉलोनाइजर्स के तौर पर दर्ज हैं। जबकि, मारवाडी अग्रवाल नगर, परमहंस नगर, केदारनगर कॉलोनी बसाने वाली शीतलेश्वर गृह निर्माण संस्था के संचालक मंडल में मंत्री उषा ठाकुर के भाई का नाम शामिल रहा है। इसे नंदबाग, भवानीनगर बसाने वाला जसराज मेहता भी भाजपा से जुड़े हुए हैं।
2018 की सूची पर भी नहीं हुई कार्रवाई
जुलाई 2018 में अवैध कॉलोनियों को बसाने वाले 100 कॉलोनाइजर्स के नाम की सूची तत्कालीन निगमायुक्त आशीष ङ्क्षसह ने डीआइजी को भेजते हुए इनके खिलाफ एफआइआर दर्ज कराने के लिए कहा था, लेकिन उस वक्त भी किसी पर कार्रवाई नहीं हुई थी। दरअसल, पुलिस हर बार निगम द्वारा दिए गए आवेदन में दस्तावेजों की कमी और अन्य कारण बताकर अवैध कॉलोनाइजर्स पर कार्रवाई नहीं करती। बताया जा रहा है कि कई अवैध कॉलोनियों को बसाने वालों ने खुद को बचाने के लिए नया फार्मूला तैयार किया है। वे अपनी कॉलोनी में क्षेत्रीय पुलिस स्टेशन पर पदस्थ पुलिस के अफसरों और जवानों को सस्ते में प्लॉट दे देते हैं, जिसके चलते उन पर कार्रवाई नहीं हो पाती है।
हाई कोर्ट ने भी दिए थे आदेश
2018-19 में जिन कॉलोनियों को राज्य सरकार ने वैध किया था, उन सभी को हाई कोर्ट ने प्रक्रिया की गड़बड़ी बताते हुए दोबारा अवैध करार दे दिया था। कोर्ट ने अधिनियम में प्रावधान के बाद भी कॉलोनाइजर्स और अफसरों पर कार्रवाई किए वैध करने को गलत ठहराया था।
अवैध कॉलोनियों को लेकर जो राज्य सरकार के तय नियम हैं, उनके हिसाब से ही हम कार्रवाई करते हैं। हमारी ओर से पुलिस को सूचना दी जाती है, केस दर्ज करना पुलिस का काम है।
- राजेश उदावत, प्रभारी योजना शाखा
Published on:
24 Dec 2022 08:01 pm
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