17 जनवरी 2026,

शनिवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पहल ने मंगलकर्ता, विध्न विनाशक गणेश के जन्मोत्सव को राष्ट्रीय त्योहार में बदला

उत्सव में झिलमिलाते कला और संस्कृति के रंग

4 min read
Google source verification

इंदौर

image

Amit Mandloi

Sep 13, 2018

bal gangadhar tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पहल ने मंगलकर्ता, विध्न विनाशक गणेश के जन्मोत्सव को राष्ट्रीय त्योहार में बदला

इंदौर. दस दिन तक चलने वाले गणेशोत्सव ने सामाजिक एकता के जरिये अंग्रेजी शासन की जड़ें हिलाने का काम बखूबी किया। विपरीत परिस्थितियों को भी आनंद और उल्लास से जोडक़र हमारे जीवन में नवचेतना का संचार किया। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पहल ने मंगलकर्ता, विध्न विनाशक गणेश के जन्मोत्सव को राष्ट्रीय त्योहार में बदला। फिर चाहे राष्ट्रीय एकता हो या सामाजिक समरसता, 10 दिनी उत्सव में हर कोई अपनी जाति, धर्म, क्षेत्रीय असमानता को भूलकर साथ आ जाता है। पिछले कुछ सालों में गणेशोत्सव का रूप बदला है। मनाने के तरीकों में बदलाव आया है। इंदौर में किस तरह पर्व मनाया जाता रहा है और किन बदलाव से गुजरा है यह पर्व, इसपर खास रिपोर्ट...


भगवान गणेश के 108 नाम, लेकिन शाह के पास 3 हजार रूप में हैं मौजूद

भगवान गणेश के 108 नाम हैं। लेकिन शहर में उनके एक भक्त राजकुमार शाह के पास उनकी ३ हजार से ज्यादा मूर्तियां हैं। पत्थर, पीतल, सोना, पेड़ों की छाल हो या फिर इंडोनेशियाई प्रतिमाएं, शाह के घर में जहां नजर पड़ती है भगवान एक नए रूप में नजर आते हैं। उत्कर्ष विहार निवासी बिजनेसमैन शाह ने बताया, बचपन में शादी के कार्ड से गणेश की फोटो काटकर रखने से शौक शुरू हुआ, जो 10 सालों से लगातार जारी है।

आज भी समाज को जोड़ रहा है १० दिनी पर्व
सत्यनारायण सत्तन
जब टीवी नहीं था, तब गणेश उत्सव में सारा शहर शामिल होता था। कवि सम्मेलन खूब होते थे और वे भोर की किरण तक चलते थे। अगर कोई आयोजक रात तीन-साढ़े तीन बजे कवि सम्मेलन खत्म करना चाहता था लोग होने नहीं देते थे, बल्कि कवियों से फरमाइशें करने लगते थे। मिलों में भी कवि सम्मेलन होते थे और शहर के अन्य पंडालों में भी। कभी-कभी तो एक ही रात में तीन कवि सम्मेलन एक साथ चलते और हम रिक्शा में बैठकर एक कवि सम्मेलन से दूसरे में जाकर कविताएं पढ़ आते और श्रोता भी ये देखते थे कि अगर कहीं मजा नहीं आ रहा है तो दूसरे कवि सम्मेलन में जाकर बैठ जाते।
1974 की नीरज-निर्भय निशा को वे लोग कभी नहीं भूल पाएंगे जो उसमें मौजूद थे। मल्हारगंज टोरी कॉर्नर पर हुए इस कवि सम्मेलन में मात्र तीन ही कवि थे एक नीरज दूसरे निर्भय हाथरसी और तीसरा मैं। हालांकि मैं संचालन कर रहा था। मात्र तीन कवि लेकिन कवि सम्मेलन रात नौ बजे से अगले दिन सुबह होने तक चला। जब सफाईकर्मी झाड़ू लगाने आए, तब लोग उठे। रातभर चलने वाले कवि सम्मेलनों के आसपास, चायवाले, मंूगफली वाले भी ठेले लगा लेते और उनकी सारी सामग्री खत्म हो जाती थी। गणेश उत्सव में नीरज, बेकल उत्साही, फना कानपुरी, बेढब बनारसी, शैल चतुर्वेदी आदि कवियों की डिमांड रहती थी। मोहल्लों में गणेश उत्सव का माहौल भी गजब का होता था। बच्चों के लिए फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता, रंगोली प्रतियोगिता, कबड्डी प्रतियोगिता आदि होती थीं। टीवी नहीं था लेकिन मोहल्ले-कॉलोनियों के किशोर और युवा मॉक पार्लियामेंट करते थे। उसमें कोई इंदिरा गांधी बनती तो कोई अटलबिहारी वाजपेयी बनता। आज भी समाज को जोड़ रहा है यह पर्व।

गली-गली में नाटक, फैलाते थे सामाजिक संदेश
अरुण डिके
गणेशोत्सव का पहले धार्मिक स्वरूप था, लेकिन लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इसे राष्ट्रीय पर्व की तरह मनवाया और घर-घर तक पहुंचाया। इंदौर में ५०-६० साल पहले उत्सव के १० दिन तक भजन-कीर्तन, नाटक, परिचर्चा व जनजागृति कार्यक्रम होते थे। बड़े भाई बाबा डिके की संस्था नाट्यभारती सहित अन्य संगठन हर गली-मोहल्ले में सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता सहित अन्य सामाजिक मुद्दों पर चेतना जगाने का काम करते थे। लेकिन आज का गणेश उत्सव पूर्व की तरह नहीं रहा। अब चंदा वसूली, डीजे का शोर परेशान करता है। मनोरंजन सही है लेकिन प्रबोधन भी होना चाहिए।

नाटक, गीत, कविताएं, श्लोक सीखने का मौका था उत्सव
जयंत भिसे, मानद सचिव सानंद
नंदलालपुरा के गणेशोत्सव पंढरीनाथ, कबूतरखाना, हरसिद्धि सहित आसपास के तमाम इलाकों का केंद्र हुआ करता था। यहां के नाटक देखने और खेलने शहर के मराठी बहुल क्षेत्रों के लोग आते थे। बच्चे लघु-नाटिकाएं करते और बड़े फुल लेंग्थ नाटक। मस्कर परिवार का नाटक मंचन में बड़ा योगदान होता था। हम बच्चों को शोभाताई यानी शोभा खेर साधना केंद्र में नाटक की रिहर्सल कराती थीं। उनके सिखाए हुए कई लोग अब शहर के रंगमंच पर सक्रिय हैं। शोभा ताई हमें नाटक, गीत, कविताएं, श्लोक आदि भी सिखाती थीं। वे मॉक कोर्ट भी कराती थीं जिसमें कोई वकील बनता तो कोई जज। मोहल्ले में एक वसंत भेंडे थे, जो अपने प्रभाव से एक ट्रक अरेंज करते और एक दिन मोहल्ले के सब बच्चों और महिलाओं को लेकर शहर भर के गणेश उत्सव दिखाकर लाते। उस वक्त हम रातभर शहर में में घूमते रहते।

पंडालों के जरिये युवा कलाकारों को मिलता था मंच
सुनील धर्माधिकारी
राजेंद्र नगर में 67 साल से संचालित हो रहे हैं। महाराष्ट्र समाज के पंडाल को शुरू करने का मकसद समाज में संगठन की शक्ति बढ़ाना और लोगों में भारतीय संस्कृति के प्रति जागरूकता बनाए रखना है। महाराष्ट्र समाज राजेंद्र नगर के अध्यक्ष सुनील धर्माधिकारी ने बताया, जिस तरह पहले इस पर्व को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होने के लिए प्रयोग किया, उसी तरह आज हमारी संस्कृति के लिए एकजुट होना जरूरी है। फूहड़ता, शोर के बिना धार्मिक, सांस्कृतिक, खेलकूद, शास्त्रीय गायन आधारित कार्यक्रम होते थे। कई युवा कालाकारों को मंच मिला।

1950 से1970तक का गणेशोत्सव होता था प्रेरणादायी
मुकंद कुलकर्णी
1950 से 1970 तक का गणेशोत्सव बहुत ही प्रेरणादायक और दिलचस्प होता था। जगह-जगह पर व्याख्यान और संगीत का एक रूप देखने को मिलता था। जगह-जगह स्थानीय समूहों द्वारा धार्मिक व्याख्यान होते थे। इनमें एक बार नाटक खाई हुआ था, जिसमें शहर और ग्रामीण संस्कृति के अंतर को बताया था। रामबाग, कृष्णपुराछत्री, जेल रोड, गणेश मंडल, स्नेहलता गंज और मिल क्षेत्र एरिया सहित लोकमान्य नगर, राजेंद्र नगर, रामबाग के गणेशोत्सव में संस्कार गीत के कार्यक्रम हुआ करते थे। 1966-67 और 1986 के दौरान कृष्णपुरा छत्री पर गणेशोत्सव के अंतर्गत मॉक पॉर्लियामेंट लगाई गई थी, जिसमें सरकार एक विषय रखती थी जैसे मिलिट्री का आधुनिकरण करना चाहिए या नहीं? बहुत ही गंभीर चर्चा होती थी। 1969 और 1970 में मॉक कोर्ट होती थी, जिसके जज मप्र विधानसभा के स्पीकर यज्ञदत्त शर्मा हुआ करते थे और शासकीय अधिवक्ता जस्टिस गोवर्धन ओझा हुआ करते थे।