
इंदौर. प्रदेश में पहली बार किसी सरकारी अस्पताल में बोन मैरो ट्रांसप्लांट पूरा किया गया। एमवाय अस्पताल में बने ट्रांसप्लांट सेंटर में ३३ वर्षीय मरीज को स्टेम सेल ट्रीट करने के बाद दोबारा इंफ्यूजन किए गए। साथ ही दुसरी महिला मरीज के स्टेम सेल हार्वेस्टिंग की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है, सोमवार को दोबारा इंफ्यूजन किया जाएगा।
गौरतलब है, शनिवार को मल्टीपल मायलोमा (ब्लड कैंसर) के मरीज उपेन्द्र जैन के स्टेम सेल गुडग़ांव के एक्सपर्ट डॉ. राहुल भार्गव ने ७ घंटे चली प्रक्रिया के बाद स्टेम सेल निकाले थे। सेल्स को पैथॉलॉजी, माइक्रोबाइलॉजी, बायोकेमेस्ट्री, ब्लड बैंक, रेडियोलॉजी की विभिन्न प्रक्रिया से गुजरने के बाद रविवार को दोबारा शरीर में डालने के लिए ट्रीट किया गया। करीब एक घंटे की प्रक्रिया में इंफ्यूजन पूरा किया गया। मरीज को सेंटर में बने आधुनिक कक्ष में करीब १५ दिन रहना होगा। इसके बाद खून की जांचों के बाद पता चलेगा, ट्रांसप्लांट कितना सफल रहा। इसके बाद डॉ. भार्गव की टीम ने ४२ वर्षीय कुसुम के स्टेम सेल निकालने की प्रक्रिया शुरू की। यह प्रक्रिया पूरी कर डॉ. भार्गव गुडग़ांव रवाना हो गए। सोमवार को उनके साथी एक्सपर्ट डॉ. संतोष गुडग़ांव से यहां आकर इंफ्यूजन की प्रक्रिया पूरी करेंगें।
आज से दो बच्चों का प्री इवेल्यूशन
ऑटोलोगस ट्रांसप्लांट के बाद एमजीएम मेडिकल कॉलेज प्रबंधन बहुप्रतिक्षित थैलेसिमिया पीडि़त बच्चों के बोन मैरो ट्रांसप्लांट की तैयारी में जुट गया है। इसके लिए ३ अप्रैल को न्यूयार्क से एक्सपर्ट डॉ. प्रकाश सतवानी अपनी टीम के साथ एमवाय अस्पताल आएंगें। उनके साथ अमेरिका में ६ माह की ट्रेनिंग लेने वाली डॉ. प्रीति मालपानी और डॉ. प्राची चौधरी प्री बोन मैरो ट्रांसप्लांट इवेल्यूशन के माध्यम से दवाओं का कोर्स शुरू करेंगी। करीब १५० बच्चों की एचएलएल टायपिंग पहले से कर वेटिंग लिस्ट तैयार की गई है। जिन बच्चों में ट्रांसप्लांट सफल होने की सबसे ज्यादा संभावना है, उनका चयन किया गया है। भविष्य में वेटिंग लिस्ट के माध्यम से ट्रांसप्लांट किए जाएंगें।
यह अंतर है दोनों ट्रांसप्लांट में
ऑटोलोगस बोन मैरो ट्रांसप्लांट- पीडि़त व्यक्ति को उच्च खुराक या हाई डोज की कीमोथेरेपी देने से पहले स्टेम सेल्स को निकाल दिया जाता है। स्टेम सेल्स को ट्रीट करने के बाद एक विशेष फ्रीजर में जमा किया जाता है। हाई डोज की कीमोथेरेपी के बाद आपकी खुद की स्टेम सेल्स सामान्य रक्त कोशिकाओं को बनाने के लिए आपके शरीर में वापस डाल दी जाती हैं। इसे रेस्क्यू ट्रांसप्लांट भी कहा जाता है।
एलोजेनिक बोन मैरो ट्रांसप्लांट- थैलेसिमिया, एप्लास्टिक एनीमिया सहित अन्य कैंसर में यह प्रक्रिया अपनाई जाती है। स्वस्थ्य स्टेम सेल के लिए डोनर की जरुरत होगी है, एचएलए टायपिंग कर अधिकतर भाई-बहन को चुना जाता है। इसके बाद मरीज में यह सेल्स इंफ्यूज किए जाते हैं। मरीज को तीन से चार सप्ताह तक विशेष संक्रमण मुक्त सेंटर में रहना पड़ता है, ताकि इम्यून सिस्टम डेवलप होने तक कोई संक्रमण ना हो।
पहला ट्रांसप्लांट पूरा कर लिया गया है। डॉ. भार्गव की टीम व मेडिसिन विभाग की टीम मरीज की देखरेख कर रहे हैं। दुसरी मरीज के स्टेम सेल निकाल लिए गए हैं, सोमवार को इंफ्यूजन के लिए दुसरे डॉक्टर आ रहे हैं। १५ दिन मरीज यहीं भर्ती रहेंगें, उसके बाद ट्रांसप्लांट का असर पता चलेगा। अगले माह थैलेसिमिया पीडि़त बच्चों के ट्रांसप्लांट की तैयारी पूरी कर ली जाएगी।
डॉ. शरद थोरा, डीन एमजीएम मेडिकल कॉलेज
Published on:
05 Mar 2018 06:10 am
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