
इंदौर. जेल में बंद एक दिव्यांग को छोडऩे के लिए परिजनों ने गुहार लगाई थी, जिस पर इनकार कर दिया गया। वे कोर्ट गए, जहां से दो माह में फैसला करने के निर्देश दिए गए। जेल व प्रशासन की राय लेने के बाद फैसला किया गया कि दिव्यांग पर कोई दया नहीं की जाएगी।
यह मामला केंद्रीय जेल में बंद अख्तर हुसैन पिता अहमद हुसैन का है। परिजनों ने आंखों से शत-प्रतिशत दिखाई न दिए जाने का आधार बनाकर जेल प्रशासन से बाकी सजा माफ कर रिहा करने की गुहार लगाई थी, जिस पर आवेदन को निरस्त कर दिया गया। इस पर परिवार ने हाई कोर्ट का दरवाया खटखटाया। कोर्ट ने जेल प्रशासन को प्रकरण का निराकरण करने के लिए दो माह का समय दिया। इसको लेकर जिला दंडाधिकारी और केंद्रीय जेल अधीक्षक से एनओसी मांगी गई। जवाब में साफ कर दिया कि चिकित्सकीय आधार पर रिहा न करने किया जाए। विधि व विधायी कार्य विभाग ने भी अपने मत में कहा कि अख्तर को पेरोल पर छोड़ा गया था। उस समय भी उसे शत-प्रतिशत दिखाई नहीं देता था।
इसके बावजूद वह पेरोल पर फरार हो गया था। मुक्त किए जाने की दशा में वह फिर अपराध नहीं करेंगा, ये कहा नहीं जा सकता। जेल नियम में चिकित्सकीय आधार पर बाकी सजा माफ किए जाने की अनुशंसा नहीं की गई है। इसके आधार पर जेल विभाग के अवर सचिव अजय नथानियल ने आदेश जारी कर दिया है। कहा है कि राज्य शासन द्वारा अनुशंसाओं के आधार पर केंद्रीय जेल में बंद अख्तर को चिकित्सकीय आधार पर बाकी सजा माफ न करने का फैसला किया जाता है।
पेरोल पर फरार होने पर नहीं मिलती रियायत
गौरतलब है कि सरकार ने आजीवन कारावास व अन्य कड़ी सजा में बंद कैदियों के लंबे समय जेल में रहने के बाद उन्हें पेरोल पर कुछ दिन बाहर रहने की छूट दे रखी है। बाहर जाने के बाद कैदी कई बार भाग जाते हंै। ऐसे में जब वे पकड़ाए जाते हैं तो उन्हें भविष्य में पेरोल नहीं दी जाती और भागने की सजा भी दी जाती है।
Updated on:
29 Mar 2018 11:22 am
Published on:
29 Mar 2018 11:17 am
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