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पहली बार : गर्भस्थ शिशु को हुआ चिकनगुनिया

बच्चे का निजी अस्पताल में गंभीर अवस्था में इलाज किया जा रहा है ...

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रणवीरसिंह कंग. इंदौर. वायरस किस हद तक खतरनाक साबित हो रहे हैं, इसका उदाहरण शहर में देखने को मिला, जब गर्भ में ही शिशु चिकनगुनिया के वायरस का शिकार हो गया। बच्चे का निजी अस्पताल में गंभीर अवस्था में इलाज किया जा रहा है। प्रदेश में पहली बार ऐसा मामला देख शिशु रोग विशेषज्ञ भी हैरान हैं। रिसर्च देखने पर, देश में पांडिचेरी में एक अन्य मामले का रिकॉर्ड मिला है।

निजी नौकरी करने वाले नीलेश तिवारी की पत्नी मंजू ने १० नवंबर को बेटे को जन्म दिया। डिलेवरी से पहले ८वें माह में पति-पत्नी दोनों को चिकनगुनिया हुआ था, जो दवाएं लेने पर ठीक हो गए। डिलेवरी के चौथे दिन अस्पताल से छुट्टी हो गई। बच्चे का नाम अर्नव रखा गया है। घर पहुंचने पर बच्चे ने दूध पीना बंद कर दिया और सांस लेने में तकलीफ होने लगी। बच्चे को इलाज के लिए शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. श्रीलेखा तिवारी के पास ले जाया गया।

उन्होंने तुरंत मेडिकेयर अस्पताल के आईसीयू में बच्चे को भर्ती कर इलाज शुरू किया। आरएनए पीसीआर टेस्ट कराने पर बच्चे को चिकनगुनिया होने की पुष्टि हुई। डॉक्टर्स ने इस तरह के केस तलाशे तो तो केवल पांडिचेरी में एक केस की डिटेल मिली।

अन्य मामले यूरोप और थाईलैंड के मिले। शहर के सीनियर शिशुरोग विशेषज्ञों से राय ली गई। लगातार इलाज के बाद ९ दिन के अर्नव की हालत स्थिर है, लेकिन अब भी प्लेटलेट्स रिकवर नहीं हुए हैं।

एक साल रहती है इम्युनिटी
चिकनगुनिया वायरल फीवर है, मादा टाइगर मच्छर इस विषाणु को फैलाता है। गर्भ में बच्चे पर इसके प्रभाव पर देश में अभी तक कोई खास रिसर्च नहीं हुई है। जो भी शोध हैं, उनमें गर्भावस्था में मां को चिकनगुनिया होने पर यह विषाणु शिशु तक नहीं पहुंचने की बात कही गई है। जिन्हें गर्भावस्था में चिकनगुनिया होता है, वे अपने शिशुओं को कुछ हद तक प्रतिरक्षण क्षमता (इम्युनिटी) प्रदान कर देती है, जो कि शिशु के साथ करीब एक साल तक रहती है। इस मामले में ऐसा नहीं हुआ।

बच्चे को सांस लेने में तकलीफ, झटके, आंत के रास्ते ब्लिडिंग, बुखार, प्लेटलेट्स डाउन होने सहित कई समस्याएं थीं। अब वह इलाज पर पॉजिटिव रिस्पांस कर रहा है। यह केस जन्मजात चिकनगुनिया का है। ऐसा मामला मैंने पहले नहीं देखा।
डॉ. श्रीलेखा तिवारी, शिशुरोग विशेषज्ञ

अर्नव के मामले में कंसल्ट के लिए बुलाया था। मैंने अपने कार्यकाल में ऐसा पहली बार देखा है। यह मामला मदर टू चाइल्ड ट्रांसमिशन का है। इस केस से पता चलता है कि वायरस का स्वरूप किस हद तक बदलकर खतरनाक हो चुका है।
डॉ. शरद थोरा, डीन एमजीएम व वरिष्ठ शिशुरोग विशेषज्ञ