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मैंने तुझे रतलाम की सेंव समझा, तू बीकाजी की भूजिया निकला

हास्य-व्यंग्य से किया दहेज प्रथा पर कटाक्ष, ऐसे ही नाटकों से जिंदा है रंगमंच, अनुराग ठाकुर द्वारा लिखित और राकेश शर्मा द्वारा निर्देशित नाटक का हुआ मं

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इंदौर

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Amit Mandloi

Jan 22, 2018

comedy play indore

नाटक ‘ये शादी नहीं हो सकती ’ का मंचन रविवार को

इंदौर.प्यार को पैसे के तराजू में नही तोलना चाहिए। समाज में आज भी लव मैरिज को पूरी तरह से स्वीकार नही किया गया है। अगर कोई प्रेम विवाह करना चाहे तो लाख अड़चने आती है। लव मैरिज में आने वाली मुश्किलों को बड़े ही मजाकियां ढंग में प्रस्तुत किया गया नाटक ‘ये शादी नही हो सकती है’में। प्रीतमलाल दुआ सभागृह में खेले गये इस नाटक का आयोजन संस्था रंग सप्तक व रंग निर्वाणा ग्रुप द्वारा किया गया। नाटक की पूरी कहानी दो प्यार करने वालों की शादी करवाने का प्रयास दिखाती है। जिनकी शादी में दहेज एक बड़ी अड़चन बनता है।संवाद में इंदौरी भाषा का प्रयोग और पोहे जलेबी का जिक्र दर्शकों को कई बार ठहाके लगाता है। प्यार की शायरी में पोहा जलेबी की बाते शामिल होती है। शादी में जीवन भर की जगह जीरावन पर का साथी बनने की बात कही जाती है। अमर प्रेम क े किरदार में कबीर मृदुल और अनुराग ठाकुर का अभिनय सराहनीय है। नाटक अनुराग ठाकुर द्वारा लिखित और राकेश शर्मा द्वारा निर्देशित किया गया। संगीत पीयूष और लाइट डायरेक्शन रोमी सेन का रहा।

कहानी

नाटक में शहर के जाने माने परिवार के लडक़े पुष्पेश को भावना से प्यार हो जाता है लेकिन भावना एक अनाथ होती है। पुष्पेश के पिता को ऐसी बहूं चाहिए थी जो दो जोड़ी में आएं लेकिन अपने साथ ढ़ेर साथ दहेज लेकर आएं। अमर प्रेम शादियां करवाने का काम करते है और पुष्पेश और भावना की शादी करवाने का काम उन्हे मिला होता है। इसके लिए वे नकली बुआ और नकली पिता लेकर आते है। उन्हे इसी तरह की प्लानिंग दर्शकों को गुदगुदाती है। लाख कोशिशों के बाद भी शादी के अंत तक यही सुनने को मिलता है कि ये शादी नही हो सकती है। आखिर में पुष्पेश के दादा की आत्मा प्रेम के शरीर में आकर बताती है कि नरक में दहेज लेने वालों को बहुत यातना दी जाती है। आखिर में पुष्पेश के पिता की आंखे खुल जाती है और वे शादी के लिए तैयार हो जाते है। नाटक के अंत में संवादों के जरिये स्वच्छता का महत्व भी समझाया गया।

कुछ गुदगुदाने वाले संवाद

-बेटा मैने तुझे रतलाम की सेव समझा, तू बीकाजी की भूजिया निकला

-तू प्रीत मैं सांझ पिया, तू पोहा मैं जलेबी

- एक इंदौरी के पेट का श्रृंगार होता है जीरावन, खाने की जान होता है जीरावन

- जीरावन से मांग भर कर, जीरावन भर का साथी बन जा