
divorce case
इंदौर। 'सिंदूर' शब्द सुनते ही सबसे पहले दो दृश्य आंखों के सामने उपस्थित होने लगते हैं, एक स्त्री की मांग और दूसरा लाल या पीला रंग। यह लाल रंग एक स्त्री की खुशियां, ताकत, स्वास्थ्य, सुंदरता आदि से सीधे जुड़ा है। हजारों-हजार वर्षों से यह रंग विवाहित स्त्री की पहचान और उसके सामाजिक रुतबे का पर्याय बना हुआ है। एक दौर ऐसा भी आया, जब इसे दकियानूसी और आउटडेटेड मान लिया गया, जिसे सिर्फ रीति-रिवाज मानने वाली स्त्रियां ही लगाती हैं, लेकिन देखा जाए तो इसका चलन कम जरूर हुआ था, मगर खत्म कभी नहीं हुआ।
इसी को ध्यान में रखते हुए कुटुंब न्यायालय ने पति की याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि सिंदूर पत्नी का धार्मिक दायित्व है और उससे यह मालूम पड़ता है महिला विवाहित है। प्रधान न्यायाधीश एनपी सिंह ने पति के पक्ष में फैसला देते हुए पत्नी के मांग में सिंदूर नहीं भरने को क्रूरता माना। कोर्ट ने 11 पृष्ठ के आदेश में गौहाटी हाईकोर्ट के आदेश का अभिमत देते हुए कहा कि पत्नी द्वारा सिंदूर नहीं लगाना एक प्रकार से क्रूरता है। यह भी माना कि पत्नी के संपूर्ण कथन से स्पष्ट होता है कि पति ने पत्नी का परित्याग नहीं किया, बल्कि पत्नी ने मर्जी से खुद को अलग किया है। कोर्ट ने पत्नी को तत्काल पति के पास लौटने को कहा है।
सिंदूर लगाने या सिंदूरदान का इतिहास लगभग पांच हजार साल पहले का माना जाता है। धार्मिक और पौराणिक कथाओं में भी इसका वर्णन मिलता है, जिसके अनुसार देवी माता पार्वती और मां सीता भी सिंदूर से मांग भरती थीं। ऐसा कहा जाता है कि पार्वती अपने पति शिवजी को बुरी शक्तियों से बचाने के लिए सिंदूर लगाती थीं। मां सीता अपने पति राम की लंबी उम्र की कामना तथा मन की खुशी के लिए सिंदूर लगाती थीं। महाभारत महाकाव्य में द्रौपदी नफरत और निराशा में अपने माथे का सिंदूर पोंछ देती हैं। एक अन्य मान्यता भी है कि लक्ष्मी का पृथ्वी पर पांच स्थानों पर वास है। इनमें से एक स्थान सिर भी है, इसलिए विवाहित महिलाएं मांग में सिंदूर भरती हैं, ताकि उनके घर में लक्ष्मी का वास हो और सुख-समृद्धि आए।
Published on:
22 Mar 2024 02:48 pm
बड़ी खबरें
View Allइंदौर
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
