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Divorce Case: हाइकोर्ट का आदेश, पति की सहमति के बिना ‘गर्भपात’ कराना क्रूरता

Divorce Case: पारिवारिक न्यायालय के आदेश को हाईकोर्ट ने रखा बरकरार, महिला की अपील खारिज

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Divorce Case

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Divorce Case: निचली कोर्ट ने माना कि पति की सहमति के बिना गर्भावस्था को समाप्त करना क्रूरता के दायरे में आता है। कोर्ट इस पर पर विचार करता है कि मामले के तथ्यों और परिस्थिति के आधार पर गर्भावस्था समाप्त करना क्रूरता के तहत आता है।

यह फैसला हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में जस्टिस विवेक रुसिया और बिनोद द्विवेदी की बेंच ने दिया। तलाक के केस में पत्नी ने पति की सहमति के बिना गर्भपात कराया था। इसे पारिवारिक कोर्ट ने क्रूरता करार देकर तलाक को भी सही माना। धार की महिला ने पति पर दहेज प्रताड़ना और तलाक का केस लगाया था

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12 से 15 दिन ही रही ससुराल में, फिर नहीं लौटी

पारिवारिक न्यायालय ने दोनों मामलों को एक कर सजा सुनाई थी। इसे महिला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कोर्ट ने आदेश में लिखा है कि महिला के पति ने शपथ पत्र में जानकारी दी है कि वह शादी के बाद केवल दो बार उसके घर आई। 12-15 दिनों तक ही साथ रही। 2017 से वह अपने माता-पिता के साथ रह रही है। इस दौरान ससुराल में गर्भवती हो गई, बाद में ससुराल आने से भी इनकार कर दिया। पति, ननद और परिवार के अन्य लोगों पर पहले दहेज प्रताड़ना का केस लगा दिया था। गर्भपात भी करा लिया।

पत्नी पर की टिप्पणी

कोर्ट ने फैसले में पत्नी पर टिप्पणी भी की है। हाईकोर्ट ने आदेश में लिखा है कि यह केवल पत्नी ही है, जिसने अपने खुद के कुकर्मों अपने पारिवारिक जीवन को बर्बाद किया है।

निचली अदालत का फैसला सही

कोर्ट में पति ने इस पर अपना पक्ष रखा। पति ने कोर्ट को बताया कि उसे बताए बिना ही पत्नी ने गर्भपात कराया था। इसे निचली अदालत ने गलत बताया था। अब हाईकोर्ट ने भी पत्नी के इस कृत्य को गलत करार दिया है। इसके साथ ही निचली अदालत ने महिला के दर्ज कराए दहेज प्रताड़ना के केस को भी खत्म करने का फैसला दिया था। कोर्ट ने कहा, इस आधार पर तलाक का जो फैसला दिया गया था, वह सही था। इसी के साथ महिला की याचिका को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया।