
इंदौर. नारी के कई रूप हैं। वह सिर्फ माँ ही नहीं, माया रूप में निर्माण को साथ लेकर चलती है। बहन, सास, बहू के रूप में मातृत्व का भाव हमेशा रहता है। पति के रूप में, पिता के रूप में भी वह पुरुष के प्रति मातृत्व भाव रखती है। धर्म, अर्थ, काम से निकलकर मोक्ष की तरफ जाना मुझे मेरी पत्नी सिखाती है, क्योंकि हम पुरुषों के मोक्ष का रास्ता एक नारी ही है। यह बातें पत्रिका समूह के प्रधान संपादक डॉ. गुलाब कोठारी ने इंदौर में आयोजित हिंदू आध्यात्मिक एवं सेवा मेले में कही। गुलाब कोठारी ने यहां कन्या वंदन पर अपने विचार रखे।
उन्होंने कहा कि कुछ चीजें नए लोगों को अटपटी लगती हैं। मेरे सामने अभी भी एक प्रश्न है कि नारी सम्मान क्यों? नारी समाज से अलग है क्या? नर और नारी मिलकर एक हैं। जिन जिन देशों में ये चर्चा चली है की ये अलग हंै वो नुकसान भुगत रहे हैं। एक सिक्के के दो पहलू हंै नर और नारी। हम व्यक्तिगत इकाई नहीं बन सकते।
नारी के बिना सृष्टि का विचार भी अधूरा
प्रकृति ने हमारी बुद्धि, आत्मा, मन, शरीर बनाया है। मैं न मर्जी से पैदा हो सकता हूँ ,न मर सकता हूँ, न विवाह कर सकता हूँ, न संतान पैदा कर सकता हूँ। यह सब प्रकृति ने तय किया है। हम माँ बाप के जरिए नहीं पैदा होते, वे माध्यम अवश्य हैं, लेकिन ये सृष्टि ईश्वर की कृति है। सूर्य कभी कुछ नहीं करता, उसकी किरणें कार्य करती हंै। विष्णु की शक्ति उनकी लक्ष्मी है। निर्माण सब स्त्री करती है, पुरुष अकेला कुछ भी नहीं। हमारे शरीर और बुद्धि की जानकारी हमें है पर आत्मा और मन की नहीं। माँ बाप अब मन और आत्मा के विषय में घर में बात नहीं करते, शायद इसलिए हम अपने अस्तित्व को समझ नहीं पाते और अप्रत्यक्ष तौर पर इसीलिए हम नारी को सम्मान देना नहीं सीख पाते।
नारी का मूल रूप ही पालन करना है
एक 5 साल की बच्ची 2 साल के बच्चे को खिलाना जानती है। बालिका को हमेशा सिखाया जाता है कि वो पालन पोषण करेगी। हमारा जीवन सूर्य से शुरू होता है, परमेश्वर का सोम तत्व जब अग्नि आहूत होता है, तो अंत में सोम बचता है और वह बचा हुआ सोम है जिससे हम सभी का निर्माण हुआ। बारिश वो सोम है, जिससे हमारा अन्न पैदा होता है। जो सृष्टि में हो रहा है, वही सब हमारे भीतर हो रहा है। सारे तत्व समान हंै। ये बातें हमारे पौराणिक आख्यानों में है, जिसे आज विज्ञान मान रहा है।
पुरुष में भी आधी नारी है
अर्धनारीश्वर का सिद्धांत जिसकी व्याख्या हम कर रहे थे, हम सबमें उसका अस्तित्व है। हम सभी में आधी नारी है,आधा नर है। सम्मान तो हर किसी का होता है, हर शरीर में विद्यमान नर नारी दोनों का सम्मान होता है। पुरुष अकेला निर्माण नहीं करता, माया निर्माण करती है। महिला खाना बनाती है, बच्चे को खाना खिला रही है, रेडियो भी सुनती है,गेट भी खोलती है। देवियों के 10 हाथ हम देखते हैं वेदों में वो यही है। महिला अनेक हाथों से काम करती है।माँ सृष्टि है, वो रचती भी है इसे, पालन भी करती है।
लड़कियां क्यों लड़का बन रही हैं
लड़कियां जब लड़कों जैसी बनना शुरू करने लगीं तब दिक्कत सामने आई। जिस आदमी से आप सम्मान चाहते हो, उसीकी नक़ल कर रहे हो। नर के दुर्गुण भी साथ आएंगे इस नकल में। तुलसी के पौधे का बीज उसने अपना जीवन न्यौछवार किया तब पौधा बना। एक स्त्री अपना अस्तित्व खोकर नवनिर्माण करती है। ये सीख एक माँ, एक महिला ही दे सकती है। अपनी चिंता छोड़कर परिवार की चिंता करना एक औरत ही सीखा सकती है। शादी के बाद ससुराल आने वाली उस महिला के भाव के बारे में सोंचे, वो सब कुछ पीछे छोड़कर आ जाती है। इस संकल्प के साथ की मैं कभी नहीं लौटूंगी,अपने संस्कारों के बूते पर आकर वो इस घर की मालकिन बनती है, तपस्या करती है और अपनी हिम्मत से अग्नि में आहूत होकर अपनी पहचान भूलकर आती है। एक घर को तारने।
अपना नाम भूलकर वो नया नाम अपना लेती है। ये बहुत बड़ा त्याग है। बस ये विश्वास और क्षमता अतिविश्वास बन जाता है तब वो महिला दुखी हो जाती है। टकराव होता है, पहचान का संघर्ष होता है और तलाक जैसे शब्द हमें सुनने को मिलते हैं। एकत्व का भाव चला जाता है। हमारा विवाह का सिद्धांत अद्वैत पर आधारित है।
ज्ञान में महिला पुरुषों से आगे है
परोक्ष ज्ञान और व्यावहारिक ज्ञान में महिलाएं पुरुषों से हमेशा आगे रही हंै। पत्नी भावों की चैनी हथौड़ी से पति की मूरत को गढ़ती है। इस सबके बाद आपको विरक्ति के मार्ग पर खड़ा करती है, वो एक औरत है। ये गुण हिंदुस्तान की नारी में है। शरीर से कोई नारी नहीं होती, इस भाव इस त्याग इस समर्पण का नाम नारी है। माँ को पहला गुरु कहते हैं, मातृदेवो भव: कहते हैं, कहाँ है देवता? जैसे एक गुठली जमीं में गढ़कर पौधा बनती है, वैसे ही देवत्व का बीज जब गढ़ता है जमीं में तो वो महिला के रूप में पल्लवित होते हैं।
Updated on:
02 Dec 2017 05:35 pm
Published on:
02 Dec 2017 05:16 pm
बड़ी खबरें
View Allइंदौर
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
