5 अप्रैल 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

किसान-कारोबारी सरकारी नीतियों से परेशान,  मंडी शुल्क बन रहा फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री पनपने में बड़ी बाधा

-रोजाना 300 करोड़ का कारोबार-सालाना 60 से 70 करोड़ रुपए मंडी शुल्क वसूली  

3 min read
Google source verification

इंदौर

image

Lavin Owhal

Oct 28, 2018

farmer news

किसान-कारोबारी सरकारी नीतियों से परेशान,  मंडी शुल्क बन रहा फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री पनपने में बड़ी बाधा

-दो मु_ी अनाज से शुरू हुआ निराश्रित कर आज भी
-किसान को पेमेंट लेने में, कारोबारी को देने में आ रही दिक्कत

तीन मंडियां

-२० पैसे प्रति सैकड़ा लिया जा रहा निराश्रित कर
इंदौर. सरकार द्वारा फसल पर लिया जा रहा मंडी शुल्क और अधिकतम खरीदी की बैंक गारंटी प्रदेश में फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज को पनपने में बड़ी बाधा है। किसान से खरीदे जा रहे माल पर एक बार शुल्क लेना तो ठीक है, लेकिन धारा-१९ में बदलाव कर परमिट अनिवार्यता की आड़ में इसकी पेनल्टी सहित वसूली से कारोबारी परेशान हैं। मार्जिन का अधिकांश हिस्सा सरकार के नियमों की भेंट चढ़ जाता है। लागत महंगी होने पर उत्पाद अन्य प्रदेशों से महंगा पड़ता है। प्रदेश की मंडियों में अनक विसंगतियों से छोटे किसान की जेब तो हलकी हो ही रही है, छोटे कारोबारियों का व्यापार भी बंद होने के कगार पर है। दूसरी ओर कॉर्पोरेटर सीधे किसानों से सौदा कर ट्रेड की परंपरा को खराब कर रहे हैं। कानून की विसंगतियों और अवैध वसूली से ज्यादा परेशानी हो रही है। निराश्रित कर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
केंद्र ने एक देश एक कर के उद्देश्य से जीएसटी लागू किया है। बावजूद इसके प्रदेश सरकारें छोटे-छोटे टैक्स या शुल्क कम नहीं कर रहीं। इससे छोटे कारोबारी परेशान हैं। प्रदेश में अनाज-दलहन व सब्जी मंडियों का इनका संचालन मंडी बोर्ड व संभागीय कार्यालयों द्वारा किया जाता है। शहर में तीन मंडियां हैं। छावनी एवं लक्ष्मीबाईनगर में अनाज व दलहन की खरीदी होती है, जबकि चोइथराम मंडी फल-सबजी खरीदी-बिक्री का बड़ा केंद्र है। यहां अव्यवस्थाओं को सुधारने के नाम पर लिए जा रहे मंडी शुल्क से पूरे प्रदेश के कारोबारी मुश्किल में हैं। तीनों मंडियों में व्यवस्थाओं के नाम पर कुछ नजर नहीं आता। किसान व कारोबारियों के लिए पीने के पानी की भी ठीक से व्यवस्था नहीं है। गंदगी पसरी रहती है। चोइथराम मंडी में खराब हो रहे फल व सब्जियों के संरक्षण की व्यवस्था नहीं है।

सकल अनाज-दलहन-तिलहन व्यापारी महासंघ के अध्यक्ष गोपालदास अग्रवाल बताते हैं, बीते तीन साल से सरकार की नीतियों ने कारोबारी व किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। सरकार से बार-बार कहने के बाद भी कानून की विसंगतियों को नहीं सुधारा जा रहा। मंडी एक्ट में संशोधनों के जरिए किसान-कारोबारियों की परेशानियां बढ़ाई जा रही हैं। पहले ही धारा-१९ की उपविधियां बनाकर पेनल्टी और दंड के प्रावधान कर दिए। अब १ नवंबर से इ-परमिट व्यवस्था अनिवार्य कर कारोबार ठप करने की साजिश की जा रही है।

दलहन को छूट, अन्य अनाज को नहीं

कारोबारियों का कहना है, सरकार मंडी शुल्क में भी भेदभाव करती है। दलहन को शुल्क से छूट दी जा रही है, जबकि अन्य उत्पादों को इसके दायरे में ले रखा है। इसके लिए अन्य राज्यों से प्रतिस्पर्धा का तर्क दिया जा रहा है, जबकि अन्य अनाज पर भी अलग-अलग राज्यों में यह स्थानीय कर के हिसाब से ही लिया जाता है, जो प्रदेश से कम है।
निराश्रित कर का हिसाब नहीं

कारोबारियों ने बताया, १९७२ में बांग्लादेशियों की सुरक्षा के लिए सरकार ने निराश्रित कर की शुरुआत की थी। तब हर बोरे से दो मु_ी अनाज के रूप में इसे एकत्रित करते थे। बाद में यह १० पैसे प्रति बोरी किया गया, अब २० पैसे प्रति सैकड़ा लिया जाता है। मंडी प्रशासन के पास इसका हिसाब-किताब नहीं है। मांगने पर आनाकानी की जाती है, क्योंकि इसका उपयोग शरणार्थियों के लिया किया जाना था। अब देश में शरणार्थी नहीं होने के बाद भी यह कर लिया जा रहा है।

डामी सिस्टम लागू किया जाए

-सरकार ने आढ़त सिस्टम बंद कर दिया। अन्य राज्यों की तरह डामी सिस्टम लागू किया जाना चाहिए। इसमें आढ़त की राशि किसान नहीं, उपज खरीदने वाला देगा।
-मंडी समितियों को स्वतंत्र व सक्षम बनाया जाए। मंडी समिति का अमला हो। प्रस्तावित सेंट्रल एक्ट के अनुसार कामकाज हो।

-पांच गुना पेनल्टी व २४ प्रतिशत ब्याज का प्रावधान समाप्त हो।
-किसानों को १० हजार नकद भुगतान का नियम हटाया जाए।

-इ-नीलामी व्यवस्था की विसंगतियां दूर करें, ताकि छोटे कारोबारी भी हिस्सा ले सकें।
-व्यापारियों के लिए बीमा और पेंशन के प्रावधान किए जाएं।