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डेढ़ हजार मिड डे मील सेंटर, लाइसेंस सिर्फ 450

स्कूल वालों का कायदे को ठेंगा, मध्यान्ह भोजन बनाने वालों के पास फूड लाइसेंस ही नहीं, अधिनियम की उड़ रही धज्जियां।

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Subhash Sharma

Feb 26, 2016

इंदौर . राज्य सरकार के सभी निगम, मंडलों को लिखे गए पत्रों के बावजूद अब तक इंदौर जिले के स्वयं सहायता समूह ने फूड लाइसेंस नहीं लिया है। इनमें अधिकांश स्कूल हैं, जो सरकारी कायदों को ठेंगा दिखा रहे हैं। जिले में करीब डेढ़ हजार मिड डे मिल सेंटर हैं, जहां खाना पकाया जाता है, लेकिन इनमें मात्र 450 ही ऐसे हैं, जिन्होंने लाइसेंस बनवाया। सरकार के आदेश को करीब पांच साल हो गए हैं, लेकिन निजी तो ठीक, सरकारी महकमे ही इसका पालन नहीं करवा पा रहे।

अंतिम तारीख 4 मई
आम आदमी को शुद्ध खाद्य सामग्री मुहैया करवाने के लिए खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 के तहत उन सभी संस्थानों, दुकानदारों, होटल संचालकों को लाइसेंस बनवाना जरूरी किया गया था, जहां खाद्य सामग्री बनती या बिकती है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण इसके लिए बार-बार तारीखें बढ़ाकर संस्थानों को इसका मौका भी दे रहा है, किंतु इसका नाजायज फायदा उठाया जा रहा है। सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन बनाने वाले स्वयं सहायता समूह भी ये लाइसेंस नहीं बनवा रहे। लाइसेंस बनवाने की अंतिम तारीख 4 मई है।

बच्चों के स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए जरूरी
मध्यान्ह भोजन देने वाले स्वयं सहायता समूह को तो ये लाइसेंस सबसे पहले देना चाहिए, क्योंकि इनका बना भोजन स्कूल, आंगनवाडिय़ों में बच्चे ग्रहण करते हैं। वहां किस गुणवत्ता का भोजन बन रहा है, इसकी निगरानी अभी नहीं हो पाती। लाइसेंस लेने के बाद उसके कड़ी शर्तों का पालन समूह करेंगे तो बच्चों को अपने आप गुणवत्तापूर्ण भोजन मिलने लगेगा।

मध्यान्ह भोजन भी हैं परिधि में
लोक शिक्षण संचालनालय, खाद्य एवं आपूर्ति, केंद्रीय भंडारण व राज्य सरकार के सभी भंडारण सहित 17 विभागों को फूड सेफ्टी के लाइसेंस बनवाने थे। इसकी परिधि में वे स्वयं सहायता समूह भी आ गए, जो मध्यान्ह भोजन योजना संचालित कर रहे हैं। सरकार ने कई बार इन्हें ताकीद भी किया, लेकिन लाइसेंस के लिए ये गंभीर नहीं हुए। ये समूह सीधे सरकारी अफसरों के नियंत्रण में काम करते हैं। इसका सीधा मतलब है कि सरकारी अफसर भी नियमों का पालन करवाने में गंभीर नहीं हैं।

अब तो तारीख पर तारीख
बीते पांच-छह सालों से फूड लाइसेंस के लिए सरकार व अफसर सख्ती करने के बजाय तारीखें बढ़ाते जा रहे हैं। इसका लाभ निजी और सरकारी दोनों उठा रहे हैं। इसका उदाहरण सरकारी नियंत्रण वाले संस्थानों से ही लगा सकते हैं। शहर में मात्र 5 से 10 ही ऐसे कंट्रोल हैं, जिन्होंने लाइसेंस बनवाया है। स्वयं सहायता समूह के सिर्फ 450 लाइसेंस तैयार हुए हैं, जबकि जिले में इनकी संख्या1582 है।

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