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एमपी में भूमि अधिग्रहण के मुआवजे से जुड़े मामले में हाईकोर्ट का कड़ा रुख

Land acquisition- केंद्र सरकार और उसके ही एक विभाग राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआइ) के बीच विवाद पर कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की

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High Court takes a tough stance on land acquisition compensation cases in MP

High Court takes a tough stance on land acquisition compensation cases in MP (Photo Source - Patrika)

Land acquisition- भूमि अधिग्रहण के मुआवजे के भुगतान से जुड़े मामले में इंदौर हाईकोर्ट का कड़ा रुख सामने आया है। केंद्र सरकार और उसके ही एक विभाग राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण(एनएचएआइ) के बीच विवाद सामने आने पर कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया। कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार और एनएचएआइ के बीच समन्वय में कमी स्पष्ट नजर आ रही है।

इंदौर हाईकोर्ट में भूमि अधिग्रहण से जुड़े मुआवजे के भुगतान का एक मामला चल रहा है। कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणी की। हाईकोर्ट के जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि केंद्र सरकार और उसकी एक संस्था बिना किसी उचित कारण या औचित्य के एक-दूसरे के खिलाफ
कोर्ट में खड़े हैं।

कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि पहले एनएचएआइ को इस मामले में प्रतिवादी बनाया गया था, लेकिन बाद में उसके स्वयं के आवेदन पर उसे पक्षकारों की सूची से हटा दिया गया। अब केंद्र सरकार ने एक नया आवेदन दायर कर एनएचएआइ को पुन: पक्षकार बनाने की मांग की है।

इस आवेदन में कहा गया है कि मुआवजे के भुगतान की ज्मिेदारी एनएचएआइ की ही है। इस पर अदालत ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि केंद्र सरकार और उसकी एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय होना चाहिए था। अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह के आंतरिक विवाद न्यायालय के समक्ष लाना न केवल अनावश्यक है, बल्कि इससे न्यायिक प्रक्रिया भी प्रभावित होती है। मामलों के निपटारे में भी खासी देरी होती है।

केंद्र सरकार का आवेदन खारिज

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह उसका कार्य नहीं है कि वह केंद्र सरकार और उसकी संस्थाओं के बीच जिम्मेदारी तय करे। यह दायित्व स्वयं संबंधित पक्षों का है कि वे आपस में बैठकर यह तय करें कि मुआवजे का भुगतान कौन करेगा। अदालत ने इस आधार पर केंद्र सरकार का आवेदन खारिज कर दिया। कोर्ट न फैसले में एनएचएआइ को लेकर टिप्पणी की कि केवल
पक्षकारों की सूची से नाम हटने से जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। यदि कानून के अनुसार उस पर मुआवजा देने की जिम्मेदारी बनती है, तो उसे वहन करना ही होगा। इसके बाद अदालत ने मुख्य अपील पर भी सुनवाई की, जिसमें भूमि मालिक ने मुआवजे को अपर्याप्त बताया था।