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hingot youdh: दिवाली के दूसरे दिन बरसते हैं आग के गोले, आमने-सामने होती है दो गांवों की सेना

hingot youdh: कोरोनाकाल में नहीं हो पा रहा है हिंगोट युद्ध, इस बार भी है संशय की स्थिति...।

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इंदौर

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Manish Geete

Nov 05, 2021

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इंदौर जिले के गौतमपुरा में दो गांवों के बीच होता है युद्ध। इसे देखने हजारों लोग होते हैं जमा।

इंदौर। मध्यप्रदेश में एक ऐसी परंपरा है जो जानलेवा साबित होती है। जिले के गौतमपुरा में सदियों से हिंगोट युद्ध खेला जाता है। यहां एक दूसरे पर आग के गोले बरसाए जाते हैं। इसमें कई लोग घायल होते हैं, यहां तक कि मौत भी हो सकती है।

दीपावली के दूसरे दिन हिंगोट युद्ध की परंपरा है। पिछली बार यह युद्ध नहीं हो पाया था। इस बार भी यहां संशय की स्थिति है, लेकिन प्रशासन मुस्तैदी के साथ इस परंपरा के लिए तमाम इंतजामों के साथ तैनात है। धार्मिक दस्तावेजों में इसका कोई उल्लेख नहीं है, लेकिन यह किंवदंतियों के कारण ही जीवित है।

यह युद्ध दो गांवों के लोगों के मध्य होता है। इसे देखने के लिए भी हजारों की संख्या में लोग उमड़ते हैं। युद्ध जैसे हालात बनने पर सुरक्षा के लिए रैपिड एक्शन फोर्स भी तैनात की जाती है।

क्यों होता है हिंगोट युद्ध

बताते हैं कि गौतमपुरा के लड़ाके मुगल सेनाओं से गांव को बचाने के लिए उन पर हिंगोट से हमला करते थे। इसके बाद से ही यह परंपरा चली आ रही है। अब यह ग्रामीणों के आस्था से जुड़ गया और सदियों से इसे दोहराया जाता है। परंपरा की वजह से अब प्रशासन भी इन्हें मदद करता है।


कलंगी और तुर्रा के बीच युद्ध

परंपरा के मुताबिक गौतमपुरा और रुणजी गांव के योद्धा आपस में लड़ते हैं। गौतमपुरा के योद्धाओं को तुर्रा और रुणजी के योद्धाओं को कलंगी नाम दिया गया है। दोनों गांवों का दल सूर्यास्त के तत्काल बाद मंदिर में दर्शन करता है और उसके बाद युद्ध के मैदान में पहुंच जाता है। यह युद्ध हार-जीत के लिए नहीं होता है, महज रोमांच के लिए खेल की तरह होता है।

कई लोग होते हैं घायल

करीब एक घंटे तक चलने वाले इस युद्ध में एक दूसरे पर हिंगोट से हमला किया जाता है। इस दौरान कई लोग घायल हो जाता हैं। प्रशासन के द्वारा मौके पर एंबुलेंस की व्यवस्था की जाती है, जिसके जरिए घायल लोगों को तुरंत अस्पताल पहुंचाया जाता है।

क्या होता है ये हिंगोट

हिंगोट एक फल होता है, जो हिंगोरिया नाम के पेड़ पर लगता है। आंवले के आकार वाले फल से गूदा निकालकर इसे खोखल कर लिया जाता है। इसके बाद इसमें बारूद भर दिया जाता है। आग दिखाने पर यह किसी अग्निबाण की तरह जलने लगता है, फिर इसे दूसरे गांव की तरफ फेंका जाता है। बारूद के साथ इसमें कंकर और पत्थर भरने से यह खतरनाक हो जाता है। अंधेरा होने से हिंगोट युद्ध का मैदान में आतिशबाजी सा नजारा लगता है।

इस बार भी संशय

पिछले साल यह युद्ध नहीं खेला गया था। इस बार भी कोविड मरीज मिल रहे हैं। इसे देखते हुए लोगों ने भी संयम रखा है। एसडीएम प्रतुल सिन्हा के मुताबिक यदि लोग इस बार भी संयम रखेंगे तो शायद आने वाले कई सालों तक हम इस महामारी से छुटकारा पा सकते हैं। फिर हर बार हिंगोट युद्ध मना सकते हैं। हालांकि कांग्रेस विधायक विशाल पटेल कहते हैं कि प्रशासन को परंपराओं पर प्रतिबंध नहीं लगाना चाहिए। जबकि इस साल चुनाव और दूसरे आयोजन के लिए प्रशासन छूट दे रहा है तो परंपरा को भी निभाने दें।

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