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मानसून में कहां पड़ेगा ‘सूखा’, कहां होगी ‘भारी बारिश’…बता देगा ये खास ऐप

MP News: यह ऐप देश के प्रमुख जैव विविधता क्षेत्रों में सूखे और भारी बारिश वाले हॉटस्पॉट की पहचान कर सकेगा ....

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Weather and Climate

Weather and Climate (Photo Source - Patrika)

MP News: बदलते मौसम और जलवायु के खतरे अब सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है। जंगलों, जानवरों और पौधों की दुनिया पर भी बड़ा असर डाल रहे हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए आइआइटी इंदौर के वैज्ञानिकों ने खास ऐप तैयार किया है। इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व प्रो. मनीष कुमार गोयल ने किया है। उनकी टीम में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ता विजय जैन भी शामिल हैं। यह ऐप देश के प्रमुख जैव विविधता क्षेत्रों में सूखे और भारी बारिश वाले हॉटस्पॉट की पहचान कर सकेगा और समय रहते जरूरी कदम उठाने में मदद करेगा।

600 से ज्यादा क्षेत्र

देश में 600 से ज्यादा ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें प्रमुख जैव विविधता क्षेत्र माना जाता है। इनमें से कई क्षेत्र चार बड़े बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट जैसे पश्चिमी घाट और हिमालय में आते हैं, लेकिन बढ़ती आबादी, मानवीय गतिविधियां और जलवायु परिवर्तन इन क्षेत्रों पर दबाव बढ़ा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर पश्चिमी घाट में आबादी का दबाव बहुत ज्यादा है, जबकि हिमालयी क्षेत्र तेजी से गर्म हो रहा है।

क्या होते हैं प्रमुख जैव विविधता क्षेत्र ?

ये ऐसे इलाके होते हैं जो दुनिया की जैव विविधता को बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। यहां दुर्लभ और अनोखी प्रजातियां हैं या उन्हें सुरक्षित रहने का माहौल मिलता है। ये क्षेत्र जंगल, रेगिस्तान, पहाड़, आद्र्रभूमि या समुद्र कहीं भी हो सकते हैं।

किसी क्षेत्र को की-बायोडायवर्सिटी एरिया घोषित करने के लिए पांच मुख्य मानदंड देखे जाते हैं….

-क्या वहां की प्रजातियां खतरे में हैं?
-क्या प्रजातियां सीमित इलाके में ही मिलती हैं?
-क्या क्षेत्र प्राकृतिक रूप से सुरक्षित है?
-क्या वहां जीवों के जीवन चक्र (जैसे प्रजनन) के लिए जरूरी स्थितियां हैं ?
-क्या उस क्षेत्र का कोई विकल्प नहीं है?

सूखा और बाढ़ दोनों बन रहे बड़ा खतरा

जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। कहीं अत्यधिक बारिश से बाढ़ जैसी स्थिति बन रही है, तो कहीं सूखा पड़ रहा है। भारी बारिश से जंगल और आद्रभूमि को नुकसान होता है, जबकि सूखा पानी पर निर्भर जीवों और पौधों के लिए खतरा बन जाता है। इससे पूरी खाद्य श्रृंखला प्रभावित हो सकती है।

70 साल का डेटा करेगा मदद

यह ऐप 1951 से 2022 तक के वर्षा और सूखे के आंकड़ों का विश्लेषण करता है। जिला स्तर पर बताएगा कि कहां-कहां खतरा ज्यादा है और भविष्य में क्या स्थिति बन सकती है। इससे वैज्ञानिकों और प्रशासन को सही समय पर फैसले लेने में मदद मिलेगी। आइआइटी इंदौर के निदेशक सुहास जोशी के अनुसार, यह ऐप रिसर्च और जमीन पर काम के बीच की दूरी को कम करता है।