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शहर की एक कॉलोनी ; यहां हर तीसरे घर में एक सदस्य को कैंसर, रात-रातभर चीखकर मर गई एक महिला

विशेषज्ञों, पीडि़तों और रहवासियों का कहना रेडिएशन ही खत्म कर रहा लोगों की जिंदगी 24 लोग अलग-अलग प्रकार के कैंसर का दर्द सहने को मजबूर 17 साल की किशोरी सहित 14 लोगों की हो चुकी है मौत

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इंदौर

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Hussain Ali

Feb 06, 2020

शहर की एक कॉलोनी ; यहां हर तीसरे घर में एक सदस्य को कैंसर, रात-रातभर चीखकर मर गई एक महिला

शहर की एक कॉलोनी ; यहां हर तीसरे घर में एक सदस्य को कैंसर, रात-रातभर चीखकर मर गई एक महिला

इंदौर. कृषि विहार कॉलोनी के लोग लंबे अरसे से ऐसा महसूस कर रहे हैं, जैसे मौत के साये में जिंदगी जी रहे हों। कॉलोनी के लोगों के लिए मोबाइल टॉवर काल का ग्रास बनकर खड़ा है। लोगों का कहना है कि टॉवर से निकलने वाले रेडिएशन का असर रहवासियों पर हो रहा है। यही वजह है कि हर तीसरे घर में एक कैंसर का मरीज देखने को मिल रहा है। पत्रिका ने कॉलोनी के लोगों से बातचीत की तो जानकारी मिली कि यहां अब तक २४ लोग अलग-अलग प्रकार के कैंसर से पीडि़त हो चुके हैं। इनमें 14 लोग असहनीय दर्द और तकलीफ सहने के बाद दुनिया छोड़ चुके हैं। पास ही बख्तावर राम नगर में भी इसी तरह की समस्या है।

कैंसर के खौफ में जी रहे लोगों ने कलेक्टर से जांच की गुहार लगाई है और यहां से टॉवर हटाने की मांग भी की है। पत्रिका जब इस कॉलोनी में पहुंचा तो पीडि़त परिवारों का दर्द छलक उठा। कई लोग बातचीत के दौरान रोने लगे। उन सभी का कहना था कि या हमारे अपनों की जान की कोई कीमत नहीं है? यहां कई घरों में दर्द और सन्नाटा दिखाई देता है।

इन दो इमारतों में कैंसर के शिकार

इस फोटो में दिख रही इन दोनों इमारतों में कैंसर ने लोगों को अपना शिकार बनाया है। दूसरी बिल्डिंग के तो हर फ्लोर पर कैंसर का एक मरीज है। ग्राउंड फ्लोर पर कामता प्रसाद रघुवंशी की लीवर के कैंसर से मौत हो गई। वहीं फस्र्ट फ्लोर पर मीरा गांधी (54) को ब्रेस्ट कैंसर था। उनकी बहू आरती गांधी बताती हैं हमें साल 2012 में पता चला था। अब मेरी सास इस दुनिया में नहीं हैं। सेकंड फ्लोर में रहने वाले अहम जोशी बताते हैं, पिता योगेंद्र जोशी (54) को पेट का कैंसर था। वे स्विमिंग में चैंपियन थे और आर्ट से भी जुड़े हुए थे। वे हर तरह से खुद को फिट रखते थे। इस मोबाइल रेडिएशन के कारण ही उन्हें यह खतरनाक बीमारी हुई है।

कैंसर का दर्द असहनीय हुआ तो की आत्महत्या

भावना जाट बताती हैं, सास कौशल्या जाट की 65 की उम्र में गले के कैंसर के कारण मृत्यु हुई। उन्हें चौथी स्टेज का कैंसर था। डेढ़ साल तक इलाज चलता रहता। वे दर्द से इतना परेशान रहती थीं कि रात-रात भर कराहती रहती थीं। पड़ोसी भी उनकी चीखें सुन सकते थे। एक रात वे बिना बताए निकल गईं और पीछे वाली मल्टी से कूदकर आत्महत्या कर ली। उनकी बीमारी की वजह यह मोबाइल टॉवर ही है। मुझे याद है कि वे बेहद फुर्तीली थीं और हर काम कर लेती थीं। उनका इस तरह से जाना दिल को हिला देने वाला था।

बयां नहीं कर सकती 17 साल की बेटी को खोने का दर्द

मनीषा अग्रवाल बताती हैं कि मैंने 17 साल की बेटी आरुषि को लीवर कैंसर के कारण खोया है। इस मोबाइल टॉवर को लेकर हम सभी दहशत में हैं। 31 मई 2012 को बेटी को खो दिया था तब से ही सोचते हैं कि या यह जगह छोडक़र हम भी कहीं चले जाएं। मैं उस मोबाइल टॉवर की तरफ नजर भी नहीं करती हूं। मुझे हमेशा यह महसूस होता है कि यह टॉवर यहां नहीं होता तो आज मेरी बिटिया मेरे साथ होती।

हम सब डरे हुए हैं

आरती वर्मा बताती हैं कि साल 2019 में ससुर जी को एसोफैगस कैंसर हुआ था। तीसरी स्टेज में हमें पता चला था। इसके बाद ये फैलकर बोन में चला गया। मेरे ससुर बहुत एटिव थे। रोजाना 4.30 बजे मॉर्निग वॉक पर जाते थे। हमारे लिए यह यकीन करना भी असंभव था। इस तरह लोगों की जान से खिलवाड़ करके या हासिल होता है?

बहू की बीमारी ने जीवन में ला दिया अकेलापन, टूट गई हिम्मत

बहू की बीमारी का जिक्र करते हुए चंद्रकाला टूट गई। उन्होंने कहा, 6 महीने पहले पता चला कि बहू (विली काला) को ब्रेस्ट कैंसर है। तब से उसे जैन कॉलोनी में मायके वालों के पास देखरेख के लिए भेज दिया। बेटा-बहू और बच्चे वहीं हैं। इस बीमारी ने हमें अकेला कर दिया। बहू की हालत देखकर मेरी हिम्मत टूटी जाती है।

कुछ दिन पहले ही आई रिपोर्ट, क्या जिंदगी इतनी सस्ती है

पिता आरसी शर्मा (80) का जिक्र करते हुए बेटी अनिता शर्मा रोने लगीं। वह बताती हैं कि कु छ दिन पहले ही बायोप्सी की रिपोर्ट आई है। उन्हें यूरिनरी लेडर में ट्यूमर है। मैं बख्तावर राम नगर में रहती हूं और मेरी खुद की भी मेमोग्राफी हुई है। मुझे समझ नहीं आता हमारी जान कि कीमत इतनी सस्ती है या?

ससुर योग सिखाते थे, यकीन करना था मुश्किल

रश्मि रघुवंशी बताती हैं कि साल 2008 में ससुर की 78 की उम्र में लीवर के कैंसर से मृत्यु हुई। वे फिट और एक्टिव थे। हर दिन गार्डन में योग सिखाया करते थे, उनका इस बीमारी से हमें छोडक़र चला जाना बहुत दुखद था। मोबाइल टॉवर से निकलने वाली रेडिएशन ही उनके लिए जानलेवा साबित हुई।

किसी ने जान गंवाई, तो कोई घर छोड़ गया

ज्यादा फ्रीक्वेंसी हो सकता है कारण

मोबाइल टॉवर रेडिएशन से कैंसर जैसी समस्याएं हो रही हैं। यह एक गंभीर मसला है। इसके ऊपर सरकार को ध्यान देना चाहिए और एक पब्लिक कमेटी बनानी चाहिए जिसमें साइंटिस्ट और रेडिएशन प्रोटेशन ऑफिसर शामिल हों। ये लोग समय-समय पर रेडिएशन को लेकर मॉनिटरिंग करें। कृषि विहार कॉलोनी में भी रेडिएशन नापा जाना चाहिए। हो सकता है कॉलोनी में फ्रीक्वेंसी ज्यादा हो। इस कारण इतने ज्यादा केस देखने को मिल रहे हैं। सेंसिटिव सेल जल्दी पकड़ में आ जाते हैं। मोबाइल रेडिएशन भी लोगों के लिए नुकसानदायक होते हैं। इसके समाधान के लिए अधिक टॉवर और कम पॉवर कॉन्सेप्ट पर काम किया जाना चाहिए। जगह-जगह पर छोटे-छोटे टॉवर लगाए जाने चाहिए। इंडिया में अमरीकन गाइडलाइन के हिसाब से टॉवर लगा रखे हैं। एक टॉवर पर ज्यादा डॉकेट्स लगाना भी ज्यादा रेडिएशन का कारण है।

शिवाकांत वाजपेयी, रेडियोलॉजिस्ट