सीमांकन व अतिक्रमण मुक्त करने की मांग, जिससे बारिश में स्वरूप मिलें, नर्मदा शिप्रा मिलन स्थल के समीप से ही उदग़म
३३ किमी की नदी जिंदा हो जाए तो २० से ज्यादा गांवों की प्यास बुझेगी
इंदौर. प्रदेश में नदियों को पुर्नजीवित करने के लिए मुख्यमंत्री की महात्वाकांक्षी योजना को स्थानीय विभाग पलीता लगा रहे हैं। खुड़ैल क्षेत्र में बहने वाली ३३ किमी लंबी जय जयवंती नदी भी इसका शिकार हो रही है। शिप्रा उद्गम स्थल के समीप से निकली यह नदी २० से ज्यादा गांवों के लिए जीवनदायिनी है, वर्तमान में इसके रक्षक ही इसके आसपास का ग्रीन बैल्ट नष्ट कर किनारों को समाप्त कर रहे हैं। ग्राम खुड़ैल बुजुर्ग में नदी की सीमा में १ किमी सीमेंट कांक्रीट की सडक़ बना दी गई है। आगे जा कर यही सडक़ ग्राम काजी पलासिया के सरकारी तालाब को भी लील रही है।
सरकार और प्रशासन एक ओर तो स्थानीय जल स्त्रोंतो को संवारने के लिए जन जागृति के साथ ही करोड़ों रुपए की शासकीय योजनाएं बना रहे हैं। मुख्यमंत्री ने नर्मदा-शिप्रा लिंक योजना को रिकॉर्ड समय में बनवा कर मालवा की नदियों के अपनी गंभीरता को जाहिर किया था। इसी कड़ी में शिप्रा के साथ जय जयवंती नदी को भी संवारने की बात कही गई। इसी के तहत सरकार द्वारा नदी पुर्नजीवन अभियान शुरू कर प्रदेशभर की ३१३ नदियों को चिन्हिंत किया गया। इस योजना के तहत इन नदियों की सीमाओं का सीमांकन होना है, इनके ग्रीन बैल्ट को संवारा जाएगा, साथ ही इनके किनारों को अतिक्रमण मुक्त करके इनकी कल-कल को वापस लौटाएंगे। इसके लिए स्थानीय ग्रामीण लोगों का भी सहयोग लिया जाना है। नदी बचाओं अभियान के विकास चौधरी बताते है, तिनौन्या से तिल्लौर तक बन रही सडक़ की चपेट में यह नदी आ गई है। इस सडक़ के अनेक हिस्से नदी की सीमा से गुजर रहे हैं। ग्राम खुड़ेल बुजुर्ग में तो नदी के मुख्य हिस्से को दबाते हुए सडक़ बना दी गई। इसके साथ ही इस पूरी नदी के किनारों पर लगे १००० से ज्यादा बड़े पेड काटे जा चुके हैं। इसकी शिकायत अनेक स्तर पर की गई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है।
कागजों में हुई पहल
खुड़ेल स्थित सदगुरू ग्रामीण विकास व अनुसंधान परिषद मप्र के विकास चौधरी व हाजी अब्दुल हबीब अपने साथियों के साथ जय जयवंती व शिप्रा नदी को बचानें में लगे हुए है। १३ साल पहले से इन दोनों नदियों को उद्गम स्थल को बचाने की पहल की गई थी। इसके कुछ सालों के बाद तत्कालीन कलेक्टर राकेश श्रीवास्तव ने शिप्रा के उद्गम स्थल उज्जैनी से शिप्रा बनाने और इसे पुर्नजीवित करने की शुरूआत की थी। इसके बाद सिंहस्थ से पहले नर्मदा शिप्रा उद्गम स्थल बना कर दोनों नदियों का मिलन कराया गया और यहीं से नर्मदा का पानी शिप्रा में छोड़ा जाता है। जय जयवंती नदी की पहल कागजों तक ही सीमित रह गई।
१००० से ज्यादा पेड़ काट दिए
विकास चौधरी बताते हैं, शिप्रा से कुछ दूर से निकल कर २० से ज्यादा गांवों से बहते हुए जय जयवंती नदी सेमल्या चाउ के समीप शिप्रा में समाहित हो जाती है। दोनों नदियां जंगल से बहती है, पहाडि़यो का पानी समेट कर बहती है। कालांतर में मानवीय हस्तक्षेप के बाद दोनों जय जयवंती नदी अतिक्रमण का शिकार हो गई। अनेक स्थानों पर इसकी धारा अवरूध कर दी गई और इसका ग्रीन बैल्ट भी लगभग नष्ट कर दिया गया। अनेक स्थानों पर आज भी यह नजर आती है, अधिकांश हिस्सा ग्रामीणों की उपेक्षा से समाप्त हो गया।
इन गांवों की जीवनदायिनी
उज्जैयनी, धमनाय, सिंध बरौदा, काजी पलासिया, खुड़ैल बुजुर्ग, मुंडला जेतकरण, रामूखेड़ी, खुड़ैल खुर्द, सेत खेड़ी, असरावद बुजुर्ग, सोन गुराडि़या, आकिया, गारिया, सेमल्याचाउ, अरनिया आदि।