
राधा-कृष्ण मंदिर
इंदौर @भूपेंद्र सिंह. हिंदू धर्म में बिना भगवान की मूर्ति वाले मंदिर की कल्पना मुश्किल है, लेकिन शहर के बीच एक ऐसा मंदिर है, जिसमें भगवान की कोई मूर्ति नहीं। इस अनूठे मंदिर में भक्त आते हैं, भोग लगता है, पूजा-अर्चना भी होती है, मगर ग्रंथों की। जी हां, गोराकुंड के पास इस मंदिर की कहानी सबसे अलग है, जिसमें भक्तों के लिए ग्रंथ ही भगवान का स्वरूप है।
यूं शहर में कई ऐसे मंदिर हैं, जो अपनी विविधता के लिए भक्तों की आस्था का केंद्र हैं, किंतु मल्हारगंज के पास गोराकुंड के इस राधा-कृष्ण मंदिर का मामला थोड़ा अलग है। करीब 400 साल पुराने ग्रंथों को यहां मूर्ति की जगह स्थापित कर वर्षों से पूजा-अर्चना की जा रही है। लोगों को भी भगवान रूपी ग्रंथों में आस्था है। उनका कहना है कि उनकी सारी मन्नतें यहां पूरी होती हैं।
100 साल पुराना है मंदिर
मल्हारगंज स्थित इस मंदिर का नाम राधाकृष्ण प्रणामी मंदिर है, जो लगभग 100 साल पुराना है। मंदिर में स्थापित ग्रंथों का प्राचीन काल से हिंदू धर्म में महत्व रहा है। प्रणामी संप्रदाय के गुरु प्राणनाथ ने ग्रंथों का अध्ययन किया तो उन्होंने जाना कि मूर्ति की तरह ही ग्रंथ भी प्रभावशील होते हैं, इसलिए मंदिर में श्रीकृष्ण स्वरूप साहब ग्रंथ स्थापित किए गए हैं। यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग इनकी पूजा और दर्शन के लिए आते हैं।
पांच बार पूजा
राधा-कृष्ण प्रणामी मंदिर अपने आप में अनूठा है। यहां स्थापित ग्रंथों को चांदी के सिंहासन पर विराजित किया है। इन्हें भगवान कृष्ण और राधा की पोषाक और मोर मुकुट पहनाया है। रोज दिन में पांच बार यहां पूजा होती है। प्रसाद में सिर्फ पान का उपयोग होता है।
देखने से लगता है, मानो मूर्ति विराजित हो
मंदिर में एकाएक जाने पर कोई पहचान ही नहीं पाता कि मूर्ति की जगह ग्रंथ रखे हुए हैं। शृंगार की वजह से ऐसा भ्रम होता है। ग्रंथों को पूरी तरह कृष्ण भगवान की तरह पूजा जाता है, इसलिए उन्हें झूला भी झुलाया जाता है। जन्माष्टमी जैसे अवसर पर मंदिर में कई आयोजन होते हैं।
गोशाला और दीक्षा केन्द्र भी
मंदिर का निर्माण होलकर राजघराने के पंच रहे मांगीलाल भंडारी ने करवाया था। यहां कई परंपराएं 100 साल से चली आ रही हैं। इसके तहत मंदिर के पीछे गोशाला और बच्चों के लिए दीक्षा केंद्र भी चलता है। श्री प्राणनाथ संस्था मंदिर संचालित करती है, जबकि देखरेख सुशीला भंडारी ‘सेठानी’ करती हैं।
महात्मा गांधी ने किया था अध्ययन
सुशीला भंडारी बताती हैं, प्रणामी संप्रदाय के कई शहरों में मंदिर हैं। महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में प्रणामी मंदिर जाने का जिक्र किया है। मंदिर में विराजित ग्रंथ कुरान और पुराण दोनों को समान बताते हैं। महात्मा गांधी के मन में ईश्वर अल्लाह तेरो नाम और वैष्णव जन तो तेने कहिए.. वाले विचार इन्हीं ग्रंथों के अध्ययन के बाद आए थे।
Updated on:
13 Aug 2017 01:20 pm
Published on:
13 Aug 2017 01:14 pm
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