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जीवन एक चक्रव्यूह, हम सब अभिमन्यु

जीवन एक चक्रव्यूह है और हम सब अभिमन्यु की तरह है। हमें चक्रव्यूह के अंदर जाने का मार्ग पता है, लेकिन निकलने का नहीं।

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Gitesh Dwivedi

Jul 18, 2016

chakravayuh

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इंदौर. चक्रव्यूह के अंदर जाना हमारा कर्म है और बाहर आना उसका फल। फल पर हमारा अधिकार न आज है और न कभी हो सकता है। कर्म सर्वोपरी है, जो अजर-अमर रहेगा। जीवन एक चक्रव्यूह है और हम सब अभिमन्यु की तरह है। हमें चक्रव्यूह के अंदर जाने का मार्ग पता है, लेकिन निकलने का नहीं।
फल की चिंता किए बगैर अच्छे कर्म करना चाहिए। यह संदेश नाटक के जरिए दिया गया। महाभारत पर आधारित 'चक्रव्यूह नाटक का मंचन रविवार को डेली कॉलेज में हुआ। इंदौर कैंसर फाउंडेशन की ओर से आयोजित कार्यक्रम में इकट्ठा हुए फंड को कैंसर मरीजों के इलाज में लगाया जाएगा। नाटक की शुरुआत कुरुक्षेत्र की भूमि पर हुए महाभारत से हुई। कृष्ण की भूमिका में अभिनेता नीतिश भारद्वाज ने महाभारत की घटनाओं को पेश कर उनसे मिलने वाले संदेश बताए।



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नाटक में बताया कि चक्रव्यूह भेदने की शिक्षा अभिमन्यु ने गर्व में ले ली, लेकिन उससे बाहर निकलने की शिक्षा नहीं मिल पाई। वह चक्रव्यूह में चला तो गया लेकिन बाहर नहीं आ सका। इस घटना से संदेश दिया कि पिता का यह कर्तव्य होता है कि वह अपने पुत्र को पूरी शिक्षा दे। इसके बाद महाभारत में योद्धायों द्वारा ली गई प्रतिज्ञाओं पर प्रकाश डाला गया।
कृष्ण ने उपदेश देते हुए कहा, 'कर्म करने के लिए या याद दिलाने के लिए प्रतिज्ञा की जरूरत नहीं होती बल्कि पौरूष से अपने अंदर आत्मविश्वास जगाना चाहिए। नाटक में बताया गया कि इंसान को सात दोष काम, क्रोध, मोह, माया, लोभ, मद और मत्सर से बचना चाहिए। अंत में नीतीश ने लोकसंग्रह शब्द का मतलब समझाते हुए कहा, 'गीता के अनुसार लोकसंग्रह का अर्थ लोगों को इकट्ठा करने से नहीं बल्कि दूसरों के लिए कार्य करने से है।