
Contaminated water
कटनी. जिले के सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने आने वाले मरीजों को डॉक्टर सबसे पहले स्वच्छ पानी पीने की सलाह देते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि जिन अस्पतालों में जलजनित रोगों का इलाज हो रहा है वहीं सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था खुद सवालों के घेरे में है। टाइफाइड, पीलिया, डायरिया जैसे रोगों से पीडि़त मरीज आएदिन अस्पताल पहुंचते हैं। इंदौर में खराब पानी से एक दर्जन से अधिक मौते होने का मामला सामने आ चुका है, इसके बावजूद अधिकांश सरकारी अस्पतालों में मरीजों और उनके परिजनों को फिल्टर्ड या मानक के अनुरूप पेयजल उपलब्ध नहीं कराया जा रहा। जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल से लेकर सिविल अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, पंचकर्म चिकित्सा केंद्रऔर संजीवनी क्लीनिक तक... हर जगह पानी की गुणवत्ता, उपलब्धता और निगरानी व्यवस्था में गंभीर खामियां सामने आई हैं।
पत्रिका टीम ने गुरुवार को जिला अस्पताल सहित जिले के तीन प्रमुख सरकारी अस्पतालों और संजीवनी क्लीनिकों का जायजा लिया। निरीक्षण में पाया गया कि ज्यादातर स्थानों पर बोरिंग से निकला पानी बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे टंकियों में भरकर मरीजों को पिलाया जा रहा है। कहने को कई जगह वाटर कूलर और फिल्टर लगे हैं, लेकिन अधिकांश या तो बंद पड़े हैं या काम करने की स्थिति में नहीं हैं। इसका सीधा असर मरीजों और उनके परिजनों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है, जो इलाज के दौरान भी दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।
350 बिस्तरों वाले जिला अस्पताल में मरीजों और परिजनों के लिए पानी की आपूर्ति के लिए करीब 40 टंकियां छतों पर रखी गई हैं। बीते दिनों की तुलना में गुरुवार को इन टंकियों पर ढक्कन जरूर लगे नजर आए, लेकिन ढक्कन हटाकर देखने पर सच्चाई सामने आ गई। अधिकांश टंकियों में ऊपर कचरा तैरता मिला, तो कहीं तल में काली काई जमी हुई थी। इन्हीं टंकियों से होकर पानी सीधे नलों तक पहुंच रहा है।
अस्पताल परिसर में कई स्थानों पर वाटर कूलर और फिल्टर लगाए गए हैं, लेकिन अधिकतर बंद पड़े हैं। जिन कूलरों से पानी मिल भी रहा है, उनकी गुणवत्ता पर सवाल है। हाल ही में जिला अस्पताल के प्रवेश द्वार के पास लगे वॉटर कूलर के पानी की जांच किट से की गई, जिसमें टीडीएस 510 पाया गया। मानकों के अनुसार 500 टीडीएस से अधिक पानी को दूषित माना जाता है, इसके बावजूद यही पानी दिनभर मरीज और उनके परिजन पीते रहे।
सरकारी मानक के अनुसार अस्पतालों में 100 व्यक्तियों पर कम से कम 450 लीटर पानी प्रतिदिन उपलब्ध होना चाहिए। जिला अस्पताल जैसे बड़े संस्थान में मरीजों, परिजनों और स्टाफ को मिलाकर हजारों लोगों की आवाजाही रहती है, लेकिन पानी की उपलब्धता और गुणवत्ता दोनों ही इस मानक से मेल नहीं खातीं। टंकियों की नियमित सफाई, लॉग बुक और मेंटेनेंस रजिस्टर की स्थिति भी अस्पष्ट है। कुछ टंकियों पर सफाई की तारीखें लिखी मिलीं, लेकिन वे दो वर्ष पुरानी थीं।
अस्पताल प्रबंधन का दावा है कि जिला अस्पताल में पानी की व्यवस्था बोरिंग के जरिए की जाती है। एक ट्यूबवेल नगर निगम का है और दूसरा अस्पताल प्रबंधन का। अधिकारियों के अनुसार करीब पांच वर्ष पहले वाटर ऑडिट कराया गया था और टंकियों की सफाई तीन माह पूर्व कराई गई है। हालांकि टंकियों के अंदर जमी गंदगी और काई इन दावों की पोल खोल देती है। हालांकि निगम अधिकारियों का कहना है कि ट्यूबवेल के पानी की समय-समय पर टेस्टिंग होती है।
अस्पतालों में स्वच्छ पानी की कमी सीधे तौर पर इंफेक्शन कंट्रोल पर सवाल खड़े करती है। दूषित पानी से न केवल मरीजों में नई बीमारियों का खतरा बढ़ता है, बल्कि अस्पताल में संक्रमण फैलने की आशंका भी बनी रहती है। आरओ और फिल्टर सिस्टम का बंद होना, टंकियों की अनियमित सफाई और वाटर टेस्टिंग व ऑडिट का अभाव... ये सभी स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर अनदेखी को दर्शाते हैं।
बरही स्थित 50 बिस्तरीय सिविल अस्पताल में पेयजल व्यवस्था और भी बदहाल है। यहां मरीजों के लिए केवल एक बड़ी पानी की टंकी है, जिससे पूरे अस्पताल में सप्लाई होती है। न वाटर कूलर है और न ही कोई फिल्टर सिस्टम। बारिश हो या गर्मी... हर मौसम में मरीजों और परिजनों को बोरिंग का पानी ही पीना पड़ता है। जिस स्थान पर नल लगा है, वहां गंदगी पसरी हुई है। प्रतिदिन करीब 500 मरीज यहां इलाज के लिए पहुंचते हैं। बीएमओ डॉ. राममणि पटेल का कहना है कि कुछ माह पूर्व टंकी की सफाई कराई गई थी और समय-समय पर ब्लीचिंग पाउडर डाला जाता है, लेकिन पेयजल की कोई वैकल्पिक या सुरक्षित व्यवस्था मौजूद नहीं है।
बड़वारा स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में मरीजों को मिलने वाला पानी संक्रमण को दावत देता नजर आया। अस्पताल की छत पर पांच टंकियां हैं, जिनमें से तीन के ढक्कन ही नहीं हैं। खुले टंकियों में गंदगी, काई और कचरा साफ दिखाई देता है। एक टंकी में कीड़े तक नजर आए। सबसे गंभीर बात यह है कि टंकियों की आखिरी सफाई कब कराई गई, इसका जवाब कर्मचारियों के पास नहीं है। प्रभारी बीएमओ का कहना है कि जल्द ही सभी टंकियों में पुख्ता इंतजाम किए जाएंगे, लेकिन फिलहाल मरीज इन्हीं हालात में पानी पीने को मजबूर हैं।
शहरी और वार्ड स्तर पर उपचार सुविधा देने के लिए शुरू किए गए संजीवनी क्लीनिकों में भी पेयजल की स्थिति चिंताजनक है। रोशननगर स्थित मुख्यमंत्री संजीवनी क्लीनिक में पानी की टंकी तो बनी है, लेकिन वह सूखी पड़ी है। कर्मचारियों के अनुसार नगर निगम ने नल कनेक्शन दिया है, लेकिन टंकी में पानी नहीं आता। मरीजों और स्टाफ को बाहर से पानी लाना पड़ता है, जिससे विशेष रूप से महिला कर्मचारियों को परेशानी होती है।
जिला अस्पताल परिसर के पीछे स्थित आयुष विभाग के पंचकर्म चिकित्सा केंद्र में पेयजल के नाम पर केवल एक नल है। यह नल ऊपर रखी टंकी से सीधे जुड़ा है, जिसमें बोरिंग का पानी बिना फिल्टर या ट्रीटमेंट के पहुंचता है। यहां न आरओ सिस्टम है और न ही पानी की गुणवत्ता जांच की कोई व्यवस्था। कर्मचारी अपने लिए घर से पानी लाते हैं, जबकि प्रतिदिन 50 से अधिक मरीज यहां इलाज के लिए पहुंचते हैं।
Published on:
17 Jan 2026 09:48 am
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