
जेएनयू को इसलिए बुरा कहा जा रहा है क्योंकि एक तो वह जवाहर लाल नेहरू के नाम पर है, दूसरे वहां वामपंथियों की संख्या ज्यादा है : नासिरा
इंदौर. शहर में 6 फरवरी से शुरू हो रहे साहित्य समागम में प्रख्यात साहित्यकार नासिरा शर्मा भी शिरकरत करने वाली हैं। इस मौके पर उनसे टेलिफोनिक बातचीत की। नासिरा ने दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) कैंपस में 28 बरस बिताए हैं। पहले उन्होंने वहां के विदेशी भाषा विभाग से पर्शियन की 5 वर्षीय डिग्री ली और फिर पश्तो में 2 साल का डिप्लोमा किया। इसके बाद जेएनयू के प्रोफेसर की पत्नी के रूप में वहां के कैंंपस में रहीं। नासिरा ने कहा, जेएनयू की पूर्व विद्यार्थी के रूप में मुझे उस संस्थान को बदनाम करने के सुनियोजित अभियान पर बहुत दु:ख होता है। जेएनयू में जो पढ़ाई का स्तर और अध्ययनशीलता का माहौल है, उसका मुकाबला देश की कोई यूनिवर्सिटी नहीं कर सकती। जेएनयू को माइलस्टोन मानकर नई यूनिवर्सिटीज की बुनियाद डालना चाहिए थी पर यह तो हुआ नहीं, बल्कि उसे बिगाड़ा और बदनाम किया जा रहा है। यह एेसा विश्वविद्यालय है जहां पिछडे़ क्षेत्रों से आने वाले युवाओं को तरजीह दी जाती है। वहां पेड़ के नीचे पत्थरों पर प्रोफेसर, स्टूडेंट्स, ड्राइवर और माली एक साथ बैठते हैं। जेएनयू को सिर्फ इसलिए बुरा कहा जा रहा है कि एक तो वह जवाहर लाल नेहरू के नाम पर है, दूसरे वहां पर वामपंथियों की संख्या ज्यादा है। मैंने कुछ बरस जामिया में भी पढ़ाया है और इन दिनों उसे भी बदनाम किया जा रहा है। यह सब बहुत दुखद है।
साहित्य में स्त्री विमर्श की बात की जाती है पर पर इसी को लेकर लिखना अच्छा शगुन नहीं है। इसी को लेकर रचनात्मक लेखन किया जाए तो वह एकतरफा हो जाता है। मैं तो मानती हूं कि स्त्री विमर्श के बजाय जिंदगी का विमर्श हो। स्त्री लेखन और पुरुष लेखन में भी विश्वास नहीं करती, क्योंकि मैं नहीं मानती कि स्त्री का लेखन अलग होता है। मैं शाहीनबाग गई थी। वहां पर आम औरत को घर से बाहर निकलकर बोलते हुए देखा। तमाम स्त्री विमर्श और स्त्री आंदोलनों का झंडा उठाने वाली महिलाएं वहां नहीं गईं। मैंने पाया कि बहुत दिनों से जो औरतें जिंदगी में धक्के खा रही थीं वे अब बोलने लगी हैं। वहां साधारण आम औरते हैं, उनका मुखर होना अच्छा संकेत है। औरतों के इस आंदोलन को केवल मुस्लिम औरतों का आंदोलन मत कहिए। वहां पर बहुत तादाद में सभी मजहबों की औरतें मुझे मिलीं। टीवी पर कुछ धारावाहिक और टेलिफिल्म्स लिख चुकीं नासिरा ने कहा, वह एक दौरा था जब दूरदर्शन की पॉलिसी थी साहित्य को टीवी पर लाने की। अब प्राइवेट चैनल्स तो बाजार की गिरफत में हैं। वे आपको यह बताते हैं कि कौन सा जेवर खरीदें और कौन सी गाड़ी पर साहित्य और संस्कृति की बात नहीं होती वहां।
Published on:
05 Feb 2020 01:20 am
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