
इंदौर. स्वच्छता में पहली बार जिस कारण से इंदौर नंबर वन बना था, उसका मूल कारण था डस्टबिन मुक्त शहर। इंदौर में डस्टबिन हटाकर नगर निगम ने लिटरबिन लगाए थे, इस कदम की सराहना पूरे देश में हुई थी। यह शहर की एक पहचान बन गया था, लेकिन अब यही पहचान ही शहर से धीरे-धीरे गायब हो रही है। शहर के कई हिस्सों से लिटरबिन गायब हो चुके हैं, लेकिन नगर निगम के अफसर इस पर कोई ध्यान ही नहीं दे रहे हैं।
शहर के मुख्य बाजारों के अलावा प्रमुख सडक़ों और ऐसे स्थान जहां बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा होते हैं, वहां पर राहगीरों के कचरे को इकट्ठा करने के लिए लिटरबिन लगवाए थे। निगम ने बाजारों में 50 मीटर और मुख्य सडक़ों पर लगभग १०० से 200 मीटर की दूरी पर लिटरबिन लगवाए थे। शहर में कहीं भी कचरा न फैले इसके लिए पूरे शहर में ३६०० लिटरबिन लगवाए गए थे। 2016 में 6 हजार रुपए प्रति लिटरबिन के हिसाब से इन्हें लगाया गया था। वहीं, स्वच्छता सर्वेक्षण के समय और वाटर प्लस का सर्वे होने के पहले निगम ने टूटे-फूटे लिटरबिन सही करवाए थे, लेकिन तीन माह के अंदर ही अब यह गायब होने लगे हैं। शहर के कई हिस्सों में यह हालत है कि लिटरबिन तो दूर, उन्हें लगाने के लिए जो स्टैंड लगाए गए थे, वह ही गायब हो गए हैं।
रिवरसाइड रोड जो कि शहर के सबसे व्यस्तम बाजार और मार्गों में से एक है। यहां पर पुलिस चौकी से लेकर संजय सेतु के बीच में चार से ज्यादा लिटरबीन सडक़ के दोनों और लगे थे, लेकिन अब यहां पर केवल संजय सेतु के सामने की ओर एकमात्र लिटरबिन ही बचा है। इसी तरह से शिवाजी मार्केट में भी पांच से ज्यादा लिटरबिन थे, लेकिन अब केवल एक ही बचा है। चिकमंगलूर चौराहे के चारों और लिटरबिन लगाए थे, लेकिन उसमें से केवल एक ओर ही बचा है। कुछ ऐसे ही हालात जवाहरमार्ग के हाथीपाला चौराहे से लेकर नलिया बाखल चौराहे तक के हिस्से में भी कई लिटरबिन गायब हो गए हैं। शहर में कई जगह पर स्टैंड तो नजर आते हैं, लेकिन बिन नहीं होते हैं। निगम से चंद मीटर की दूरी पर रामबाग पुल से लगाकर लीटरबीन लगे थे, लेकिन वो बिन फिलहाल गायब हैं। इसी तरह से एसएएफ के ईगल केफे के पास में मौजूद लिटरबिन भी गायब हो गया है।
वहीं, पोलोग्राउंड पर लघु उद्योग निगम के दफ्तर के आगे की ओर लगे लीटरबीन भी गायब हैं, जेलरोड पर मस्जिद के सामने उषा फाटक की ओर जाने वाले रास्ते के यहां लगे लीटरबीन गायब हो चुका है। वहीं पूरे शहर में जो बिन लगे हैं, उनमें से कई लिटरबिन टूट-फूट रहे हैं। मल्हाराश्रम के पास लगे लीटरबीन टूट-फूट रहे हैं, पोलोग्राउंड बैंक के पास लगे लिटरबिन भी टूट रहे हैं। इसी तरह से फूटी कोठी चौराहे पर लगे लीटरबिन, मालवा कन्या विद्यालय के सामने लगा लिटरबिन भी टूट रहा है। एमआर-4 पर लक्ष्मीबाई स्टेशन के पास, हरसिद्धि चौराहे पर मौजूद लिटरबिन भी टूट रहे हैं।
लगाए थे जीपीएस टैग
शुरूआत के दो सालों में लिटरबिन गायब होने पर उनकी सुरक्षा के लिए नगर निगम ने इनमें जीपीएस टैग लगाने की बात कही थी। निगम ने जीपीएस टैग लगवाए भी थे। लेकिन उसके बाद से इस पर ध्यान ही नहीं दिया गया और धीरे-धीरे शहर से लिटरबिन गायब होते थे, लेकिन अब तो तेजी से पूरे के पूरे स्टैंड ही गायब हो रहे हैं।
दो कंपनियों को दे रखा है ठेका
नगर निगम ने लिटरबिन के मेंटेनेंस के लिए दो कंपनियों को ठेका दे रखा है। इन दोनों कंपनियों को सालाना 20 लाख रुपए तक का पेमेंट नगर निगम करती है। इन्हें बीन के अलग-अलग हिस्सों के हिसाब से भुगतान किया जाता है।
वापस लगवा देंगे
लिटरबिन में कचरा होने और उन्हें रोजाना खाली होने के कारण कुछ लिटरबिन टूट जाते हैं। उन्हें सुधारने का काम भी चलता ही रहता है। ये एक सतत प्रक्रिया है, जहां लिटरबिन नहीं है वहां पर हम वापस लगवा देंगे। - संदीप सोनी,
अपर आयुक्त
Published on:
31 Aug 2021 08:43 pm
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