मांडू उत्सवः पर्यटकों की पहली पसंद है मालवा का स्वर्ग

 मांडू उत्सवः पर्यटकों की पहली पसंद है  मालवा का स्वर्ग

गणगौर नृत्य की हुई आकर्षक प्रस्तुतियां, तीन करोड से बनेगा भारत भवन जैसा मांडू में भवन।

धार।  मांडू का दर्शन कश्मीर का आभास देता है। यहां हरी-भरी वादियां, नर्मदा का सुरम्य तट ये सब मिलकर मांडू को मालवा का स्वर्ग बनाते हैं। चार वंशों परमार काल, सुल्तान काल, मुगल काल और पवार काल का कार्यकाल देख चुका मांडू जहाज महल चर्चित स्मारक है।

नवंबर, दिसंबर और जनवरी माह में सबसे ज्यादा लोग पर्यटन स्थलों पर पहुंचते हैं। यदि आप नववर्ष और सर्दियों की छुट्टियों को बिताने कहीं जाना चाहते हैं तो मांडू में आपका स्वागत है। अभी मांडू में मांडू उत्सव चल रहा है। प्राकृतिक सुंदरता में रंगारंग कार्यक्रम का मेल मांडू के सौंदर्य में चार चांद लगाता है। 

मांडू उत्सव का 22 दिसम्बर को सायं 6 .30 बजे पूर्व केंद्रीय मंत्री विक्रम वर्मा के मुख्य आतिथ्य में शुभारंभ हुआ । कार्यक्रम में पूर्व केंन्दीय मंत्री विक्रम वर्मा ने कहा कि उत्सव किसी क्षेत्र विशेष की पहचान होते है उत्सवों में उस क्षेत्र की संस्कृति की झलक देखने को मिलती है उन्होंने कहा कि उत्सवों से क्षेत्र की संस्कृति एवं पर्यटन को बढावा मिलता है वहीं कलाकारों को अपनी कला दिखाने के लिए उचित मंच व अवसर भी मिल जाता है।


उन्होंने कहा कि मांडू की अपनी अलग पहचान है । धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व के साथ -साथ पर्यटन की दृष्टि से पूरा स्मारक भी मौजूद है। जो प्राचीन व एतिहासिक कलाकारो की कलाओं का स्मरण कराते है ।  नागदा गुजरी मार्ग बन जाने से आवागमन की सुविधा बढेगी वही मांडू में नर्मदा का पानी लाए जाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मांडू उत्सव की गतिविधियों को अलग-अलग विभाग एक-एक दिन की जिम्मेदारी लेकर सामूहिक रूप से आयोजित करे तो माण्डू उत्सव को और भव्य रूप दिया जा सकता है।


 उत्सव की शुरूआत वायलिन व तबले की जुगलबंदी से हुई। वायलिन पर डॉ देशराज वषिष्ट तथा तबले पर पंकज राठौर ने संगत दी। प्रारंभिक प्रस्तुति राग विहाग में विलम्बित एक ताल रचना कैसे सुख सौवे श्याम मूरत चित चढ़ी की हुई। इसके बाद मध्य लय की रचना लट उलझी सुलझा जा वालम की प्रस्तुति हुई।

तबला वादक पंकज राठौर ने कुछ गत टुकडे पेश किए जिन्हें उपस्थित जन समूह ने काफी सराहा। वायलिन पर वैष्णव जन तैने ने कहिए परि पराई जाने रे भजन की मिश्र खमाज राग की प्रस्तुति ने दर्शकों की खूब दाद बटोरी। श्रोताओं ने तालियों की गडगडाहट से प्रस्तुति को सराहा।


जुगलबंदी के बाद उत्सव के मुख्य आकर्षण सिंहस्थ नाद नाटक की प्रस्तुति हुई। जिसे विशाल कलमकर द्वारा निर्देशित किया गया । सिहंस्थ नाद समुद्र मंथन की कथा तथा सिंहस्थ कुम्भ की पौराणिक कथाओं पर आधारित था। समुद्र मंथन की कथा दुर्वासा ऋषि द्वारा देवताओं को श्राप देने के साथ हुई जिसमें देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई। दैत्यराज बलि ने देवराज इंद्र को हराकर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया।

भगवान विष्णु ने देवताओं को समुद्र मंथन की सलाह दी। समुद्र मंथन से निकले अमृत का पान कर देवता अमर हो जाते है व देवताओं को राक्षसों को हराने में सफलता मिलती है। सिहस्थ नाद का मंचन उज्जैन के कलाकारों ने विशाल सांस्कृतिक एवं लोकहित समिति के बैनर तले किया । समुद्र मंथन की इस कथा ने उपस्थित दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया सभी ने एकटक व शांति भाव से कथा का आनंद उठाया।

तीसरी व अंतिम प्रस्तुति निमाड़ क्षेत्र की प्रसिद्ध गणगौर नृत्य की हुई गणगौर की प्रस्तुति बड़वाह के सिद्धहस्त कलाकर संजय महाजन व उनके दल ने दी । शुरुआत गणेश वंदना से हुई बाद में रामायण की चौपाइयां की प्रस्तुति संजय महाजन ने एकल प्रस्तुति देकर की। इसके बाद पनिहारी,झालरिया तथा गणगौर की सामूहिक प्रस्तुतियां हुई। गणगौर जो कि निमाड की प्रसिद्ध प्रस्तुति है जिसमें गणगौर माता के रूप में मां पार्वती को सिर पर रखकर महिलाओं एवं पुरूषों की सामूहिक प्रस्तुति हुई। गणगौर की प्रस्तुति ने दर्शकों का मन मोह लिया।

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