21 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल का खिताब इंदौर के बजाय भोपाल के नाम

-भोपाल के हमीदिया अस्पताल में होगी दोगुनी क्षमता-एमवायएच नहीं रहेगा प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल-सुपर स्पेशलिटी का इंतजार, कई सुविधाएं अटकीं

3 min read
Google source verification

इंदौर

image

Amit Mandloi

Sep 20, 2018

इंदौर. प्रदेश में सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एमवायएच का खिताब जल्द भोपाल के हमीदिया अस्पताल के नाम हो जाएगा। इसकी बड़ी वजह बिना मास्टर प्लान निर्माण करना है। मेडिकल कॉलेज नई सुविधाओं के लिए सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के प्रोजेक्ट के भरोसे है। इस इंतजार में कई सुविधाएं कतार में हैं।

63 साल से एमवायएच प्रदेश में चिकित्सा क्षेत्र की सबसे बड़ी संस्था के रूप में जाना जाता रहा है। इसकी क्षमता906 बिस्तर की है, लेकिन 1300 से ज्यादा मरीज भर्ती रहते हैं। एमजीएम मेडिकल कॉलेज के अधीन एमवायएच के अलावा कैंसर, चाचा नेहरू व मेंटल अस्पताल आते हैं। हाल में तैयार एमटीएच महिला अस्पताल की नई इमारत में महिलाओं और बच्चों के लिए 550 बेड होंगे।

एमवायएच की पहली मंजिल पर चल रहा महिला रोग व प्रसूति विभाग भी शिफ्ट हो जाएगा। यहां करीब 250 बिस्तर हैं। ढक्कनवाला कुआं में सुपर स्पेशलिटी अस्पताल का काम चल रहा है। वहीं भोपाल के हमीदिया अस्पताल में 1500 बिस्तर की नई इमारत का काम वर्ष 2016 से चल रहा है, जिसे अगले वर्ष तक पूरा करने की मियाद है। एम्स में भी हजार बिस्तर की व्यवस्था की जा रही है।

एमवायएच के हिस्से आ रहा सिर्फ इंतजार
वायरोलॉजी लैब :
एमजीएम मेडिकल कॉलेज में माइक्रोबायोलॉजी लैब में डेंगू, चिकनगुनिया आदि की जांच होती है। स्वाइन फ्लू सहित अन्य गंभीर वायरल के नमूने जांच के लिए भोपाल व जबलपुर भेजे जाते हैं। भोपाल एम्स के बाद हमीदिया अस्पताल की लैब तैयार है, पर हाई कोर्ट की दखल के बाद भी शासन बजट मुहैया नहीं करा पाया।
बर्न यूनिट : बर्न यूनिट सुधारने के कई प्रस्ताव बने। सुपर स्पेशलिटी प्रोजेक्ट में पुरानी इमारत में ही प्लास्टिक सर्जरी विभाग शुरू करने की योजना बनाई गई।

एमआरआइ-सीटी : एमवायएच में एमआरआइ और सीटी स्कैन के लिए निजी कंपनी पीपीपी मॉडल में डायग्नोसिस्ट सेंटर चला रही है, लेकिन मरीजों को निजी अस्पताल के बराबर पैसा देना पड़ता है। प्रदेश के अन्य बड़े अस्पतालों में खुद की डायग्नोसिस्ट यूनिट है।

एनआइसीयू : एमवायएच की पहली मंजिल पर नवजात के एनआइसीयू में गत वर्ष आग लगने के बाद इसे नए सिरे से बनाने का काम पूरा नहीं हो पाया है। इसके लिए पुख्ता योजना नहीं है।

कैथ लैब : दिल के मरीजों के इलाज के लिए बनाई गई कैथ लैब की योजना ६ साल तक कागजों पर घूमती रही। बाद में नए प्रोजेक्ट के नाम पर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

बिना प्लानिंग निर्माण, सजा भुगत रहे मरीज
एमवायएच की बड़ी समस्या आधी-अधूरी और बेतरतीब प्लानिंग है। 1955 में मुख्य इमारत सात मंजिला बनाई गई थी। आइडीए ने ओपीडी तीन मंजिल बनाकर दीं। सभी निर्माण में प्लानिंग का अभाव दिखता है। सारी सुविधाएं एक छत के नीचे जुटाने के बजाय खाली जगह निर्माण किया गया। इससे जगह तो बर्बाद हुई ही, मरीजों की परेशानी भी बढ़ गई। ओपीडी में जांच के बाद मरीज को आइपीडी, मेंटल, ऑर्थोपेडिक्स, टीबी व चेस्ट विभाग की इमारतों में भेजा जाता है। अस्पताल के पिछले हिस्से में भी कुछ सुविधाएं के लिए मरीजों को चक्कर काटना पड़ते हैं।

-पहली मंजिल की सुविधाएं एमटीएच में पूरी तरह शिफ्ट होने के बाद प्लानिंग की जाएगी। यह तकनीकी विषय है, इसलिए अभी कोई प्लान नहीं बनाया है। बर्न यूनिट को चेस्ट व ऑर्थोपेडिक्स विभाग की नई इमारत के ऊपर बनाया जाएगा। इसके लिए बजट मिल चुका है। दिल के इलाज की सुविधा हमारा कमजोर पहलू है, इसे लेकर काम करेंगे।
डॉ. वीएस पाल, अधीक्षक, एमवाय अस्पताल

एक्सपर्ट व्यूप्लानिंग की कमी दिखाई देती है
अस्पताल की मुख्य इमारत के अलावा कई ब्लॉक बन गए हैं। निर्माण में प्लानिंग की कमी दिखती है। सुविधाओं के बिखराव के साथ अप्रोच की भी कमी है। मेडिकल कॉलेज की कई एकड़ जमीन खराब हो चुकी है। यहां खाली जमीन पर बिना प्लानिंग निर्माण किए गए, कभी मल्टीस्टोरी बनाकर सुविधाएं एक छत के नीचे लाने के प्रयास नहीं हुए। बर्न, ऑर्थोपेडिक्स जैसी सुविधाएं ओटी पास होना चाहिए, उन्हें मुख्य इमारत से दूर कर दिया गया। मास्टर प्लान बनाकर काम किया जाता तो शासन से मिलने वाले पैसे का सही उपयोग होता और मरीज भी परेशान नहीं होते।
डॉ. प्रदीप भार्गव, रिटायर्ड एचओडी आर्थोपेडिक्स विभाग