
संदीप तेल हत्याकांड : व्यावसायिक राजधानी में अवैध कारोबारियों की समानांतर सत्ता
इंदौर. डिब्बा कारोबारी संदीप अग्रवाल की हत्या ने व्यावसायिक राजधानी में कारोबारी प्रतिद्वंद्विता की नई पर्तें उघाड़ दी हैं। करोड़ों रुपए रोजाना का अवैध कारोबार समानांतर सत्ता की तरह बाजारों पर कब्जा जमा चुका है। कारोबारियों का दावा है, अकेले इंदौर शहर में हर दिन डेढ़ हजार करोड़ रुपए का डिब्बा कारोबार हो रहा है। इसमें कारोबारी 200 करोड़ से अधिक का मुनाफा कमा रहे हैं। इसके बाद ब्याजखोरी में रोज 500 करोड़ से अधिक की रकम इधर से उधर हो जाती है। सट्टा कारोबार भी 1000 करोड़ रुपए प्रतिदिन से अधिक पर जा पहुंचा है। काले बाजार में रुपए की इतनी आवाजाही ही आपसी प्रतिस्पर्धा को आपराधिक रंजिश में बदल रही है। प्रॉपर्टी के सौदों और झगड़ों के निराकरण के लिए गुंड़ों का इस्तेमाल तो पुराना है, लेकिन अब उनके हाथ में बंदूक थमा कर हत्या कराने तक बात पहुंचने लगी है तो यह शहर के लिए चिंता का विषय है। क्योंकि इसमें सिर्फ कारोबारी व गुंडे ही नहीं बल्कि अफसर और नेताओं का गठजोड़ भी सामने आ रहा है। डर है कहीं व्यावसायिक शहर, अपराधों की राजधानी न बन जाए। शहर में चल रहे अवैध धंधों पर छ्व की विशेष रिपोर्ट...
पूरा धंधा बगैर लिखा-पढ़ी के सौदे पर होता है। इसके चलते पैसा वसूली के लिए कारोबारी गुंडों को भी साथ रखते हैं। राजनेताओं और पुलिस से भी अपने संबंध बनाकर रखते हैं। इसके चलते वसूली और हिसाब के नाम पर जानलेवा हमले, मारपीट यहां तक कि हत्या तक से भी नहीं चूक रहे।
शहर के हर बाजार में चल रहा डिब्बा
प्रदेश के मुख्य बाजार इंदौर शहर में सराफा, कपड़ा बाजार, अनाज मंडी, किराना बाजार सहित अन्य जिंसों का बड़ा कारोबार होता है। यहां करोड़ों का लेन-देन रोजाना किया जाता है। हर बाजार में करीब ६00 से 1०00 सेंटर वायदा का कारोबार कर रहे हंै। इसमें बड़े सेंटर 15 से 20 हैं। दिन भर में बड़ी तेजी-मंदी होती है। हाजिर बाजार में जब कोई कमोडिटी खरीदी जाती है तो एक साथ पूरा भुगतान करना पड़ता है, लेकिन कमोडिटी वायदा बाजार में कुछ रकम (मार्जिन) देकर भी कारोबार किया जा सकता है। हर कमोडिटी को खरीदने या बेचने के लिए ६ से 10 फीसदी के बीच मार्जिन तय होता है। भारी उतार-चढ़ाव की स्थिति में स्पेशल मार्जिन भी लगाते हैं। इसी कारण जल्द पैसा बनाने की चाह में कारोबारियों का इसमें रुझान बढ़ा। अमित सांवेर व संदीप तेल ने ऐसे ही लोगों को अपने डिब्बा कारोबार में फंसाया।
कमोडिटी वायदा बाजार की आड़ में हो रहा धंधा
कमोडिटीज ट्रेडिंग की शुरुआत 1875 में बॉम्बे कॉटन ट्रेड एसोशिएशन लि. के साथ हुई थी और इसी का अनुसरण करते हुए 1900 में गुजराती व्यापारी मंडली बनी थी। कमोडिटी बाजार में मुख्य रूप से रॉ मटेरियल्स (कच्चा माल) के अगाऊ यानी आगे की तारीख के सौदे किए जाते हैं। कायदे से इन सौदों में माल की डिलीवरी होना चाहिए, लेकिन ९० फीसदी सौदे में नफे-नुकसान का लेन-देन होता है। वैधानिक वायदा कारोबार में यह हर महीने की तय तारीख को सेटेलमेंट के दिन होता है। इसकी आड़ में डिब्बा कारोबार में दैनिक, साप्ताहिक व मासिक आधार पर नफे-नुकसान का लेन-देन होता है।
इंदौर में ही डिब्बों की चल रही 4 हजार लाइन
इस अवैध कारोबार में रोजाना डेढ़ से दो हजार करोड़ रुपए तक का कारोबार इंदौर में ही पन्नों पर उतर रहा है। सराफे में दो बड़े कारोबारी, विजयनगर में सयाजी होटल के पास, काछी मोहल्ला, मल्हारगंज, इमली बाजार पॉलिथीन मार्केट, जूना पीठा, गोराकुंड, नृसिंह बाजार, उषानगर, 56 दुकान, एमजी रोड पर ट्रेजर आइलैंड के सामने, हाई कोर्ट के सामने, छावनी धानमंडी, मुराई मोहल्ला, लोहामंडी से डिब्बा कारोबार का संचालन किया जा रहा है। 4 हजार से ज्यादा डिब्बे की लाइनों के जरिए छोटे डिब्बे के कारोबारी अवैध तरीके से सौदे काट रहे हैं।
10 हजार रुपए लगाकर कर रहे लाखों की कमाई
वायदा को सरकारी मान्यता मिलने के बाद डिब्बा कारोबार तरीके से होने लगा है। कारोबारी वायदा एक्सचेंज की टर्मिनल (लाइन) या फे्रंचाइजी ले लेते हैं। वायदा बाजार में जिन वस्तुओं सोना, चांदी, मेटल, एनर्जी आदि का सौदा होता है, उसमें ही डिब्बा कारोबार चलता है। वायदा बाजार में निवेशक उसके खाते में मौजूद पैसों के आधार पर माल की खरीद-फरोख्त कर सकता है, जबकि डिब्बा में कोई सीमा नहीं होती। डिब्बे के कारोबार में महज 10 हजार रुपए खाते में होने पर एक किलो सोने तक का सौदा कर सकता है। वायदा टर्मिनल वैध होने से पुलिस या एजेंसी उसकी आड़ में चल रहे अवैध कारोबार को भी पकड़ नहीं पाती। न ही उसे कोई सबूत मिलते हैं।
गुजरात तक फैला कारोबार
डिब्बा कारोबार में इंदौर के छोटे कारोबारी, रतलाम, मंदसौर, नीमच में बैठे बड़े कारोबारियों को सौदा उतारते हैं। कुछ लोग गुजरात के वलसाड़, सूरत, अहमदाबाद के बापू नगर में सौदा आगे बढ़ा देते हैं। छोटी रकम और पैसा लगाने वाले को हुए नुकसान वाली राशि खुद ही रखकर सौदा नहीं होना बता देते हैं। पैसा लगाने वाला जो राशि बताता है, उससे कुछ ऊपर के भाव पर सौदा काटते हैं और उसकी बताई राशि से 10 से 20 रुपए कम की दर पर बेच देते हैं। इसमें जो बीच की राशि होती है, उसमें ही हजारों रुपए एक ही सौदे में खड़े हो जाते हैं। इंदौर में होने वाले कारोबार में रोजाना 200 करोड़ से ज्यादा की कमाई डिब्बा कारोबारी कर रहे हैं।
सब्जीवालों से लेकर बिल्डर तक ब्याज के चंगुल में
डिब्बा, सट्टा, जुआं आदि अवैध कारोबारों की अधिकांश कमाई ब्याज में चलाई जा रही है। सब्जीवालों से लेकर बड़े बिल्डर तक ब्याज के भंवर में फंसे हुए हैं। शहर में ब्याज का कारोबार ही 500 करोड़ रुपए रोज से अधिक का है। सब्जीमंडी में 10 फीसदी रोज की दर पर पैसा उपलब्ध करा रहे हैं। ये कारोबारी केवल एक चेक, कुछ संपत्ति और स्टाम्प पर लिखवाकर बड़े बिल्डर्स को भी पैसा उपलब्ध करा रहे हैं। इन्हें 4 से 6 फीसदी की दर पर पैसा उपलब्ध करा रहे हैं। पिछले दिनों सूदखोरों के खिलाफ मुहिम चलाई गई थी, मगर अब फिर सब ठंडा पड़ा है।
इन पर हो रहा बड़ा निवेश
अधिकतर बड़े डिब्बा कारोबारी करोड़ों रुपए की आय को अलग-अलग तरह से निवेश कर देते हैं। इंदौर में अधिकतर कारोबारी राइसपूलर, लिब्राकॉइन, बिटक्वाइन, एंटिक, इंजन (दोमुंहा सांप) और जमीनों में निवेश के साथ ही ब्याज पर भी पैसा चला देते हैं।
राइसपुलर
चांदी, तांबा और धातु के सैकड़ों साल पुराने बरतन, सिक्के और अन्य ऐसी सामग्री जिसमें रेडिएशन आने लगता है, वे राइस पुलर कहलाते हैं। रेडिएशन के कारण ये लगभग एक फीट दूरी से चावल के दाने को खींच लेते हैं और दाने इस पर बगैर किसी सहारे के चुंबक की तरह चिपक जाते हैं। ऐसी चीजें सैटेलाइट से निकलने वाली फ्रीक्वेंसी, मोबाइल फ्रीक्वेंसी, एटॉनामिक एनर्जी, परमाणु बम बनाने में इस्तेमाल होती हैं, इसलिए इनकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 900 से हजार करोड़ रुपए प्रति इंच तक होती है। चूंकि ऐसी धातुएं पुराने खजाने या जमीन के नीचे ज्यादा मिलती हैं, इसलिए इसे कहां से लाया गया, ये बताने में कोई मुश्किल नहीं होती है। नॉमिनल राशि जमा करने के बाद भारत सरकार की रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) से इसे रजिस्टर करवाया जा सकता है। इसके बाद ये धातु वैध तरीके से ही करोड़ों रुपए में बेची जा सकती है। आयकर या अन्य छापामारी में भी अफसर इसकी सही कीमत नहीं आंक पाते हैं और करोड़ों रुपए का माल आराम से घर में ही रखा रहता है।
एंटिक
सिक्के और करोड़ों रुपए मूल्य के पुराने सामान में पैसा निवेश किया जाता है। चूंकि समय के साथ इनकी कीमत और बढ़ती जाती है, इसलिए इसे बेचने पर पैसा बढ़ता ही है। एंटिक भी शो पीस बताकर उनकी सही कीमत को छुपाकर टैक्स चोरी की जाती है।
इंजन
यानि दो मुंहा सांप चीन सहित एशिया के कई देशों में इनकी कीमत करोड़ों रुपए में होती है। इसे बेचना भी आसान होता है। नेपाल और अन्य हिमालय की तराई वाले राज्यों में इसका सौदा आराम से हो जाता है।
प्रॉपर्टी
जमीनों और अचल संपत्तियों के दाम भी लगातार बढ़ते रहते हैं। इसके चलते अधिकांश कारोबारी पैसा इसमें लगा देते हैं या फिर जमीन का कारोबार करने वालों को ब्याज पर पैसा दे देते हैं।
क्रिकेट के बाद लॉन टेनिस का भी हो रहा सट्टा
इंदौर में रोज करीब हजार करोड़ रुपए का सट्टा कारोबार हो रहा है। अधिकतर काम ऑनलाइन चल रहा है। सट्टा खेलने वाले मोबाइल फोन की मदद से कहीं पर भी ऑनलाइन ही बाजी लगाते हैं। रतन, कल्याण, महालक्ष्मी, धनलक्ष्मी, राजस्थान, पंजाब डे जैसे कई पुराने सट्टे के भाव भी ऑनलाइन ही खुलते हैं। क्रिकेट का सट्टा खाने वाले भी तकनीक के सहारे चल रहे हैं। कई सटोरियों ने अपनी वेबसाइट बना ली हैं। कम से कम एक लाख रुपए जमा करने पर लॉगइन आईडी और पासवर्ड जारी करते हैं। स्टेडियम में मैच और टीवी पर मैच के बीच 3 मिनट का अंतर होता है और पैसा लगाने वाले टीवी देखकर पैसा लगाते हैं ऐसे में प्रसारण के बीच के समय में अधिकतर सटोरिए ऑनलाइन भाव देखकर पैसा खाते हैं। हालांकि क्रिकेट के सट्टे को लेकर लगातार पुलिस की कार्रवाई और आईसीसी की सख्ती के बाद सटोरियों ने अब लॉन टेनिस का रुख कर लिया है। लॉन टेनिस, फुटबाल, रग्बी, बास्केटबाल पर भी सट्टा लग रहा है। ब्रिटेन में सट्टा कारोबार वैध होने के कारण वहां इसकी ऑनलाइन बेटिंग होती है। इंदौर के कई सटोरियों ने भी लंदन में वेबसाइड रजिस्टर्ड करा रखी हंै और वहां से ऑनलाइन सट्टा चला रहे हैं।
चलाते हैं खुद की लाइन
कई कारोबारियों ने डिब्बे की अपनी ही लाइन बना ली है। ये लोग इन लाइनों पर अपने फायदे के हिसाब से ही भाव ऊपर नीचे करते हैं। ऐसे भी इंदौर में कुछ कारोबारी हैं, जिनकी खुद की बनाई लाइनें इंदौर के बाहर गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली और यूपी तक चल रही हैं।
छोटे शहरों में बड़ा नेटवर्क
कारोबारियों के अनुसार, मध्यभारत का सबसे ज्यादा सट्टा रतलाम में लगता है, लेकिन पुलिस और सरकार के दबाव के चलते अब सटोरियों ने छोटे शहर महू, नीमच, मंदसौर, सुनेल, आगर, घटिया, बड़वाह, सनावद, महेश्वर, मंडलेश्वर, अंजड को अपना ठिकाना बना लिया है।
इंदौर के हैं ये बड़े खिलाड़ी
सट्टा कारोबार कर रहे कई सटोरियों के पूरे नाम अभी भी छुपे हुए हैं, हालांकि ये सट्टा बाजार में अपने उपनाम या दूसरे नामों से फेमस हैं। इनमें सुभाष महू, छब्बू सेठ, गोपाल सेठ, गुडुआ, मुन्ना चाय, पवन सिंधी, बंटी चक्की, लाहिया, पुनीत बनिया, मनीष स्टील, तेली 60 फीट रोड, जग्गा, आदि नाम हैं।
बाहर होते कारोबारी
- डिब्बा कारोबार ने बाजार को खासा नुकसान पहुंचाया है। वायदा में भारी तेजी-मंदी के कारण कई व्यापारी इससे तौबा कर चुके हैं, लेकिन सट्टे की आदत के चलते डिब्बा कारोबार के चक्कर में फंस गए। डिब्बा कारोबार ने कई व्यापारियों के डब्बे उड़ा दिए हंै।
आनंद चौकसे, सराफा कारोबारी
बड़े गेम्बलरों के हाथो में कमान
- विदेशी तर्ज पर किसानों और मिलर्स के लिए शुरू किया गया वायदा कारोबार अब डिब्बे के रूप में बड़े गेम्बलरों के हाथों में चला गया है। इसकी मूल अवधारणा बहुत पीछे छूट गई है। केवल बड़े व्यापरी ही बाजार में तेजी-मंदी कर मुनाफा काट रहे हैं।
प्रकाश व्होरा, अनाज कारोबारी
युवा फंस रहे भंवर में
- जल्द से जल्द पैसा कमाने की लालच में युवा इस डिब्बा कारोबार में फंस रहे हंै। अनुभव कम होने के कारण युवावर्ग इस भंवर में से नहीं निकल पाते हैं और गलत निर्णय ले लेते हैं। उन्हें बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है।
गोपालदास अग्रवाल, मध्यप्रदेश अनाज-तिलहन महां संघ अध्यक्ष
Published on:
18 Jan 2019 12:30 pm
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