
इंदौर. मैंने कभी बहुत बड़ा करने का नहीं सोचा बस इतना महसूस किया कि जो काम कर रहे हो उसमें पूरा डेडिकेशन हो। भीड़ से अलग होना आसान नहीं है। इसके लिए वो जुनून चाहिए जो मुश्किल रास्तों में भी सुकून की सांस लेना सिखाए। ज्यादा काम होने पर लोग बेचैन हो जाते हैं। मेरा मानना है कि बेचैनियों से चैन जिस दिन मिल जाएगा उस दिन कामयाबी जरूर मिलेगी।
ये बात स्पीकर के रूप में यूएस की कंपनी इम्पेटस के सीईओ और एसजीआईटीएस के एलिमुनाई प्रवीण कांकरिया ने शनिवार को कॉलेज की एलुमिनाई एंड कॉन्कलेव मीट में कही। इस कार्यक्रम में कॉलेज के पुराने स्टूडेंट्स ने अपने अनुभव साझा किए।
जिंदगी में सीखने के लिए फेलियर क ो फे स करना जरूरी है। एक किस्सा शेयर करते हुए उन्होंने कहा कि मेरा फस्र्ट ईयर का रिजल्ट जब आया तब मेरी रैंक ९१ थी। सीएस और इलेक्ट्रॉनिक्स सेकंड ईयर में एडमिशन लेने के लिए टॉप रैंकिंग जरूरी थी क्योंकि दोनों ही ब्रांच में लिमिटेड सीट्स थी। इसके मुताबिक मुझे बाकी दो सेमेस्टर में टॉप २ और ३ में होना जरूरी था। हार्ड वर्क किया और टॉप १० में जगह बनाई और सीएस में एडमिशन लिया। उस दिन समझ आया कि सक्सेस का कोई शॉर्टकट नहीं होता। आज के यंगस्टर्स का अल्टीमेट गोल अर्निंग हो गया है। ये नहीं होना चाहिए। प्रोस्पेक्ट्स की बात करने से ज्यादा जरूरी है अपनी च्वॉइसेज को समझना। मेरा मानना है कि जिस दिन यंगस्टर्स फैमिली और सोसायटी के प्रेशर छोड़ इंडिपेंडेंट थिंकिंग पर फोकस करेंगे तो ग्रोथ ज्यादा अचीव कर पाएंगे।
हार्ड वर्क का कोई ऑप्शन नही
१९८० बैच के एलिमुनाई और ग्रीन बिल्डिंग कंसल्टेंट पंकज धाकर बताते हैं कि मैंने हमेशा हार्ड वर्क में यकीन किया। सक्सेस पाने के लिए मेरे पांच मंत्र हैं जिसे मैंने हमेशा फॉलो किया।
१. सक्सेस का कोई शॉटकर्ट नहीं होता।
२. हार्ड वर्क, इमानदारी और डेडिकेशन का कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
३. लीडरशीप स्किल सफलता के लिए सबसे जरूरी है।
४. प्रोफेशन के साथ मत बढ़ो, अपने प्रोफेशन को अपने साथ बढ़ाओ।
५. सफलता एक रास्ता है मंजिल नहीं।
चुपचाप घुस जाते थे क्लासरूम में
१९८१ बैच के आनंद सोनसले (चैयरमेन नेपा लिमिटेड) बताते हैं कि हमारा बैच लास्ट बैच था, जिसने बहुत ज्यादा रैङ्क्षगग फेस की। फस्र्ट ईयर में हम सीनियर से इतना खौफ खाते थे कि रानीसराय होस्टल की तरफ से निकलने में भी हमें डर लगता था। होस्टलर्स की सीनियर्स से दोस्ती हो जाती थी, लेकिन डे स्कॉलर्स तो बस यही सोचते थे कि किस तरह चुपचाप क्लास में घुस सकें। ४० साल नैवी में रहा और अब नेपा नगर में कागज की मिल में हूं। अच्छा लगता है जब भी पुरानी यादों का हिस्सा बनने का मौका मिलता है।
सीखने की थी ललक
एरावत फार्मा के डायरेक्टर एचसी जैन ने अपने एक्सपीरियंस शेयर करते हुए कहा कि शुरुआत के सेमिस्टर में तो एटीकेटी भी देखी है, लेकिन मेरे अंदर सीखने की ललक थी। मैंने ३०० रुपए की नौकरी की तब सैलरी के बारे में नहीं सोचा। ये सोचा कि जॉब रिस्पॉंन्सबिलिटी क्या होगी और सीखने को क्या मिलेगा। आज पैकेज देख कर यंगस्टर्स जॉब सलेक्ट करते हैं। मुझे लगता है कि आज सीखने की ललक खत्म हो गई है और पैसे कमाने की होड़ शुरू हो गई है।
कम्यूनिकेशन स्किलस पर करें फोकस
एलएंडटी इंफोटेक के डिलीवरी ट्रांसफॉर्मेशन हेड उदय घरपुरे ने कहा कि आज जब हम यंग जनरेशन को देखते हैं तो लगता है कि हमारे सामने टेक्निकल चैलेंज कितने ज्यादा है। मुझे याद है जब हॉलैंड में था तब एक कॉल कनेक्ट क रने के लिए २५ बार डायल करना पड़ता है। इस जनरेशन के पास एडवांटेज है। सक्सेस के लिए खुद को एक्सपे्रस करना आना चाहिए। इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स को साइकोलॉजी, सिंगिंग, आर्ट और लिटरेचर को भी समझना चाहिए। इंजीनियर मशीन बनाता है, लेकिन मशीन का उपयोग इंसान ही करता है। उनकी जरूरतों को समझना बहुत जरूरी है।
Published on:
23 Dec 2017 10:59 pm
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