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हमें सात पीढियों के भरण-पोषण का धन वैभव भी मिल जाए तो संतुष्टि नहीं होती

नर में नारायण के दर्शन की अनुभूति - नृसिंह वाटिका में भागवत ज्ञानयज्ञ का समापन, मना कृष्ण-सुदामा मिलन का भावपूर्ण उत्सव

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हमें सात पीढियों के भरण-पोषण का धन वैभव भी मिल जाए तो संतुष्टि नहीं होती

bhagwat me sudama ke per dhote krashna इन्दौर। भागवत का पहला सूत्र यही है कि बहुत कम समय के जीवन में हम संतुष्ट और प्रसन्न रहने का पुरूषार्थ करें। सुख-दुख आते-जाते रहते हैं लेकिन अपनी पूर्ति के बाद भी हम नर में नारायण के दर्शन की अनुभूति करते रहें। धर्मसभा के साथ गृहसभा की जिम्मेदारी भी निभाएं। दूसरों की संपत्ति देखकर खुश रहना भी हमें आना चाहिए। श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता इसलिए भी इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में दर्ज है कि उनमें कोई स्वार्थ नहीं था। हमें सात पीढियों के भरण-पोषण का धन वैभव भी मिल जाए तो संतुष्टि नहीं होती। शुक्रवार को कश्मीर के महामंडलेश्वर विश्वात्मानंद सरस्वती महाराज ने नृसिंह वाटिका में चल रहे संगीतमय भागवत ज्ञानयज्ञ के समापन दिवस पर कृष्ण-सुदामा मैत्री एवं भागवत धर्म की व्याख्या के दौरान उक्त विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भागवत तन के साथ मन से श्रवण करने की कथा है। मन को जगत के बजाय जगदीष में लगाएं। मन को माखन की तरह निर्मल एवं निर्दोष बना लेंगे तो भगवान खुद दौड़े चले आएंगे। साधना-आराधना और उपासना तभी सार्थक होगी, जब उनमें वासना नहीं होगी। भागवत मौत को मोक्ष में बदलने की कालजयी चाबी है। इस अवसर पर कृष्ण-सुदामा मिलन का भावपूर्ण उत्सव भी मनाया। भजन पर तो समूचा पांडाल नाच उठा। कथा शुभारंभ के पूर्व घनश्यामदास लुधियानी, इविप्रा अध्यक्ष शंकर लालवानी, मुंबई के वासुलाल नागदे, जबलपुर के चंदर धींगरा, मुंबई के विजयेंद्र सिंह तथा अतुल दावानी ने व्यासपीठ का पूजन किया। जम्मू-कश्मीर से आए करीब 70 संतों को भी आज विदाई दी गई, जबकि महामंडलेश्वर स्वामी विश्वात्मानंद सरस्वती शनिवार को विमान से इलाहाबाद के लिए प्रस्थित होंगे।