
Constitution
संदीप पारे@ इंदौर. वे संविधान की मूल प्रति का निर्माण करने वाली टीम का हिस्सा थे। राष्ट्रीय प्रतीक को बनाने के लिए उन्होंने दो महीने तक कोलकाता के चिडिय़ाघर में शेरों को करीब से निहारा। मुलताई के जागीरदार परिवार से होने के बाद भी विनम्रता को ही उन्होंने अपनी पहचान बनाए रखा। शांति निकेतन से शिक्षा पाई और हैंडलूम बोर्ड में नौकरी के दौरान मुंबई से इंदौर आए तो फिर यहीं के होकर रह गए। हम बात कर रहे हैं, देश के ख्यात चित्रकार और इंदौर की शान रहे दिवंगत दीनानाथ भार्गव की। इस गणतंत्र दिवस पर हमने चर्चा की उनकी धर्मपत्नी प्रभा भार्गव से।
यूं आकार लेने लगी पं. नेहरू की इच्छा
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि संविधान की डिजाइन बनाने का कार्य शांति निकेतन करे। इसके लिए नंदलाल बोस ने टीम बनाई, जिसमें दीनानाथ भार्गव को भी स्थान मिला। वहां से डिप्लोमा कर रहे भार्गव साहब ने सारनाथ स्तंभ को कई बार देखा। फिर उन्हें किसी ने सुझाव दिया कि शेरों के वास्तविक हाव-भाव का अध्ययन करने से डिजाइन अधिक जीवंत बन सकता है। फिर क्या था... भार्गव साहब कोलकाता जू पहुंच गए। करीब ढाई महीने तक नर, मादा शेर और बच्चों को देखते रहे। उनके हाव-भाव के साथ ही नाखून तक का अध्ययन किया और जब पृष्ठ को बनाया तो इन सभी बातों को जीवंतता के साथ उकेरा।
नहीं दिया जीजाजी का परिचय : भार्गव साहब जागीरदार परिवार से थे, पर कभी रुतबा नहीं बताते थे। एक किस्सा बताते हुए वे कहते थे कि जीजाजी इलाहाबाद हाई कोर्ट में जज थे। एक बार किसी ने पूछा, जज साहब कौन हंै? तो मैंने जवाब दिया हमारी कास्ट के ही हैं। जब उनसे पूछा गया कि एेसा क्यों किया? तो उनका जवाब था, मैं अपनी पहचान से खड़ा होना चाहता था।
इस वजह से दोबारा बनाना पड़ा एक पेज
प्रभा भार्गव बताती हैं कि दीनानाथ साहब जब पेज डिजाइन कर रहे थे उस दौरान एक पेज पर ब्रश गिर गया। चूंकि इसकी सुंदरता प्रभावित हो गई थी, इस वजह से इसे संविधान समिति के सामने नहीं ले जा सकते हैं। इसके बाद पृष्ठ को दोबारा बनाया गया, लेकिन अधूरा पेज रखा रहा। वे बताती हैं कि उस पेज को कई दिनों बाद भार्गवजी ने बोस साहब से पूरा करने का आग्रह किया। वह पूरा पृष्ठ आज भी हमारे पास है जो संविधान के साथ ही उनकी याद को भी ताजा कराता है।
Published on:
26 Jan 2018 11:19 am
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