मसूरकर ने कार्यक्रम की शुरुआत राग वसंत से की, जिसकी बंदिश थी और राग सब बने बराती दूल्हा राग वसंत। इस बंदिश ने माहौल में वासंती रंग घोल दिया। इसके बाद उन्होंने कुछ दादरे और ठुमरी सुनाई। राग मिश्र पहाड़ी में दादरा था, रंगी सारी गुलाबी चुनरिया मोहे मारे नजरिया सांवरिया...। इसके बाद राग किरवानी में दादरा सुनाया, क्या जादू कर डारा दीवाना किए श्याम...। दो दादरों से महफिल जमाने के बाद उन्होंने राग सोहनी में एक ठुमरी सुनाई, काहे को मोरे घर आए...। ठुमरी और दादरों के बीच मसूरकर ने एक होरी भी सुनाई जिसके बोल थे, आज बिरज में होरी रे रसिया...। इस होरी के बाद फिर एक दादरा गाया और अंत में भैरवी में बंदिश गाई, हमारी अटरिया पे आजा रे सांवरिया....।