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समाज के मार्मिक मुद्दों को सहज अभिनय से किया व्यक्त

सहज अभिनय में व्यक्त की विस्थापन की पीड़ा, सूत्रधार के आयोजन में छत्तीसगढ़ के तीन एकल नाटकों का मंचन

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इंदौर . सूत्रधार के एकल नाटक का आयोजन अभिनय को एक अलग मुकाम देता है । जिसमें बड़ी ही सहजता से समाज के मार्मिक मुद्दों को प्रस्तुत किया है जैसे असहाय मजदूर की विस्थापन की पीड़ा को मंच पर जीवंत किया और दर्शको तक आसानी से पहुंचाया । रविवार की शाम सूत्रधार के आयोजन में छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने तीन एकल नाटक मंचित किए।

ख्यात कवि विनोद कुमार शुक्ल की लंबी कविता रायपुर- बिलासपुर संभाग को पढ़ते हुए छत्तीसगढ़ के गरीब मजदूरों के बड़े शहरों की ओर पलायन - विस्थापन की पीड़ा का अहसास होता है लेकिन वही कविता जब मंच पर नाटक की तरह घटित हुई तो जैसे असहाय मजदूर का दर्द दर्शकों की रग -रग में समा गया। रविवार की शाम सूत्रधार के आयोजन में छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने तीन एकल नाटक मंचित किए जिनमें से रायपुर के अभिनट समूह ने एक नाटक विनोद कुमार शुक्ल की कविता पर किया। योग मिश्र के निर्देशन में अभिनेता संजीव मुखर्जी ने बेहतरीन आंगिक और वाचिक अभिनय से कविता को मंच पर जीवंत किया। कविता का एक - एक शब्द मोती की तरह साफ समझ में आ रहा था और उनकी आंखें और उनकी देहभाषा जैसे कविता को इस तरह आत्मसात कर रही थी कि वो दर्शकों तक आसानी से पहुंच रही थी। अभिनय के अतिरेक से बचते हुए उन्होंने बेहद संयमित मुख मुद्राओं से शब्दों को अर्थ दिए। मजदूर का ट्रेन में नीचे सिकुड़ते हुए बैठना और अपने गांव - घर की याद करेले की बेल का मंडप आदि सब कुछ अंदर तक महसूस हुआ।
अभिनट की एक और प्रस्तुति थी कैमरे की आंख। आनंद हर्षुल की कहानी पर आधारित ये नाटक भी वंचित वर्ग की पीड़ा पर ही था। एक डॉक्युमेंट्री बनाने वाली टीम छत्तीसगढ़ के कोरबा में पहुंचती है। टीम को एक बूढ़ आदिवासी के जीवन का फिल्मांकन करना है। बूढ़े के बेटे और पोते चिकित्सा के अभाव में दम तोड़ चुके हैं। बूढ़े की पीड़ा इतनी घनी हो जाती है कि उसके आंसू कैमरे की आंख में उतर आते हैं और फिल्म नहंी बन पाती। बूढ़े आदिवासी के रूप यहां भी संजीव मुखर्जी ने प्रभावित किया।
एक अकेली औरत
तीसरी प्रस्तुति भिलाई के सूत्रधार समूह की थी। अभिनय और निर्देशन सिग्मा उपाध्याय का था। दारियो फो की इटेलियन कहानी पर आधारित इस नाटक की नायिका एक एेसी महिला है जिसके जीवन में बहुत सी तकलीफें हैं लेकिन फिर भी वो खुशमिजाजी के साथ उनका सामना करती है। घर छोटा बच्चे के एक्सीडेंट में घायल देवर की देखभाल करती है। पति उस पर हमेशा शक करता है, उसे पीटता है लेकिन पति को खुश रखना उसका कर्तव्य है। सिग्मा उपाध्याय ने भी सहज अभिनय से महिला के दर्द को अभिव्यक्त किया।