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शिक्षक दिवसः टीचर की जिद ने बदहाल स्कूल को बना दिया स्मार्ट

फिल्म गीता रानी की तर्ज पर नवाचार, बिना सरकारी मदद के स्कूल सुधार दिया। राष्ट्रीय स्तर पर पहुंची स्कूल की कहानी।

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मनीष यादव
इंदौर. साउथ की फिल्म मेडम गीता रानी की कहानी की तरह ही बेटमा के सरकारी स्कूल की भी कहानी है। फिल्म में जिस तरह से प्रिसिंपल गीता रानी स्कूल की हालत सुधारने के साथ ही बच्चों का विकास करती है और यह हालत ले आती है कि निजी स्कूल के संचालक उनसे दुश्मनी रखने लगते है।

ऐसी ही कहानी इस स्कूल के प्रिसिंपल की भी है। फर्क सिर्फ इस इतना है कि फिल्म में महिला प्रिसिंपल थी तो यहां पर पुरुष ने यह जिम्मेदारी संभाली है। उन्होंने न सिर्फ स्कूल की हालत सुधारी। बल्की बच्चो को निजी स्कूल के विद्यार्थियों से पढ़ाई लिखाई में बल्की खेल कूद से लेकर दूसरी गतिविधियों तक में टक्कर लेने लायक बनाया। अब हालत यह है कि बिना किसी सरकारी मदद के स्कूल के इस विकास की कहानी राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गई है।

यह स्कूल है बेटमा कन्या शाला की। स्कूल की हालत सुधारने वाले वह शिक्षक है वहां के हैडमास्टर रामेश्वर मंडलोई। कक्षा आठवी तक इस स्कूल की हालत पहले काफी खराब थी। हालत यह थे कि यहां पर बरसात में स्कूल की छुट्टी ही करना पड़ती थी। यहां तक तक की लड़कियों का स्कूल होने के बाद भी एक बाथरुम नहीं था। बच्चियों को खुले में लघुशंका के लिए जाना पड़ता था। इससे कई बार मनचले भी वहां पर इकठ्ठा हो जाते थे। अब हालत यह है कि इस स्कूल में स्मार्ट क्लासेस लग रही है। वहीं किसी निजी स्कूल के विद्यार्थियों की तरह की यहां के बच्चियां न सिर्फ अंग्रेजी बल्की संस्कृत में भी पारंगत है।

पहले छोडऩा चाहते थे
मंडलोई ने 2007 में बेटमा कन्या शाला की कमान संभाली थी। जब पहले दिन आए तो बरसात के कारण स्कूल के मैदान में पानी भरा हुआ था। हालत यह थे कि स्कूल की बिल्डिंग तक शिक्षिकों का पहुंचना मुश्किल था, बच्चों का पहुंचना तो दूर की बात है। स्टॉफ से बात हुई तो पता चला कि बरसात में यहीं हालात रहते है। स्कूल में मैदान की जगह एक गड्ढा है। जिसमें पानी भरने पर स्कूल की छुट्टी ही करना पड़ती है।

हालात देखकर शिक्षा विभाग के अधिकारियों से उनका ट्रांसफर कर देने के लिए भी कह आए। अगले दिन लगा कि भागेंगे तो लोगों को क्या जवाब देंगे और फिर जुट गए हालत सुधारने में। सबसे पहले खुद की सैलरी से पांच हजार रुपए दिए। इसके बाद स्टॉफ को फिर आसपास के लोगों को जनसहयोग के लिए तैयार किया। मैदान का गड्ढा भराया गया और फिर दूसरे काम कराए गए। बच्चों के लिए फर्नीचर तक उपलब्ध कराया गया। धीरे-धीरे स्मार्ट क्लास तक शुरू हो गई।

पहले स्टॉफ फिर बाकी सब
स्कूल में जाइन करने के साथ ही उन्होंने स्टॉफ से भी कह दिया था कि वह जब तक है, तब तक क्लास में ऐसे ही पढ़ाना होगा, जैसे अपने बच्चों को पढ़ाते है। अगर ऐसा नहीं कर सकते है तो या खुद अपना ट्रांसफर करा ले या फिर उनकी शिकायत कर या राजनैतिक दबाव से उनका ट्रांसफर करा दे। इसके बाद उन्हें लापरवाही मिलेगी तो कार्रवाई करेंगे। स्टॉफ ने भी उनका भरपूर साथ दिया। स्कूल में किसी भी काम के लिए रुपयों की जरुरत पड़ी तो सबसे पहले स्टॉफ ही आगे आता है।

बच्चों की मदद
रामेश्वर मंडलोई के मुताबिक सरकारी स्कूल में अधीकतर गरीब बच्चे आते है। छोटी बच्चियों के पास में चप्पल भी नहीं रहती थी। इसलिए सबसे पहले एक चप्पल बैंक बनाया गया, जिसमें चप्पलें खरीद कर रखी गई। जिस भी बच्ची के ऐसे हालत नहीं होते की माता-पिता उसे चप्पल जुते दिला सके। वह उस बंैक से अपनी पसंद की चप्पल ले सकती है। ठंड में यहां पर गर्म कपड़े भी रखे जाते है।

जन्मदिन पर खजाने में डाले
स्कूलों में कई बच्चों के पास में कापियां नहीं रहती है। शिक्षक ने कॉपी चेक करने का बोला तो वह छुट्टी मना लेते है। इसके बाद जब टीचर भूल जाए, तब वापस आते है। इस समस्या को खत्म करने के लिए शिक्षण सामग्री का एक बैंक बनाया गया है। जिस भी बच्चे का जन्मदिन होता, वह स्कूल में टॉफी बांटने के बजाए। उतने ही कीमत की शिक्षण सामग्री जैसे कॉपी पैन या पैंसिंल उस बैंक में लाकर डाल दे। इसके बाद जिसे जरुरत रहती वह उस बैंक से जरुरत का सामान ले लेता। माता-पिता के पास रुपए आने पर वह उन्हें नई कापी दिलाते तो वह इस बैंक में आकर जमा कर दे।

स्टेज भी बनवाया
बेटमा में आयोजित कार्यक्रमों में निजी स्कूल के बच्चे अपना प्रदर्शन किया करते थे। कन्याशाली की लड़कियों को वहां पर ले जाया गया। कार्यक्रम के बाद उन्होंने आकर बताया कि वह स्कूल में मैदान में सबके सामने अपना कार्यक्रम करती है, लेकिन जब नगर के कार्यक्रम में जाती है तो वहां पर स्टेज होता है। स्टेज पर जाने पर सबकों देखकर डर लगता है।

इसके बाद बच्चों के लिए स्टेज बनवाया गया। इसके लिए रुपयों की जरुरत पड़ी तो वहां से शिक्षकों ने नवरात्री में वहां पर कन्या भोज करा दिया। इस दौरान दान देने वालों के सहयोग से स्टेज बन गया। बच्चों के प्रदर्शन को देखते हुए निजी स्कूलों में पढऩे वाली छात्राओं ने भी कन्याशाला में एडमिशन ले लिया। इस स्कूल की छात्राओं की संख्या 700 तक पहुंच गई थी, जो कि अपने आप में ही एक रिकार्ड था। कोरोना काल में न के बराबर नए एडमिशन होने से अभी संख्या कुछ कम हुई है।

स्कूल की कहानी राष्ट्रीय स्तर
मंडलोई के मुताबिक हाल ही में एक सरकारी योजना के तहत ऐसे स्कूलों से जानकारी मांगी गई, जहां पर गैर सरकारी मदद से विकास हुआ हो। ऐसे में इंदौर जिले से दो स्कूलों का चयन हुआ था। बाद में उनका स्कूल की कहानी प्रदेश स्तर तक गई थी। वहां से चयन होने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर काम चल रहा है। हर प्रदेश से एक स्कूल की कहानी को प्रदर्शित किया जाएगा। वहीं टॉप टेन स्कूलों का भी चयन होना है।