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तहसीलदार का आदेश निकल गया फर्जी

सीएम हेल्पलाइन व जनसुनवाई के चलते कर दिया था निराकरण, पटवारी के पास पहुंचा तो सामने आई हकीकत ठगा सा महसूस कर रहे पीडि़त बुजुर्ग  

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मोहित पांचाल
इंदौर। जमीन खरीदने के वर्षों बाद भी जब राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण नहीं हुआ तो पीडि़त ने सीएम हेल्पलाइन व जनसुनवाई में शिकायत की। उस पर हरकत में आई तहसीलदार ने प्रकरण का निराकरण कर दिया। बकायदा उसका आदेश भी दिया, जिसके बाद शिकायत वापस हो गई। जब पीडि़त उसे अमल कराने पटवारी के पास गया तो मालूम पड़ा कि आदेश तो फर्जी है।

ये वाकया 902, सी-ब्लॉक शिवम् अपार्टमेंट एमजी रोड निवासी रतनलाल पिता सत्यनारायण सराफ (70) के साथ हुआ। उन्होंने लसूडिय़ा मोरी सर्वे नंबर 55/1/1 की 0.056 हेक्टेयर यानी 6000 वर्गफीट जमीन नारायण तिवारी व अकबर अली से खरीदी थी। उसके बाद पंजी पर नामांतरण हो गया लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में अब तक एंट्री नहीं हुई थी।

इस पर रतनलाल ने पहले तो तहसील के चक्कर लगाए लेकिन काम नहीं बना तो उन्होंने सीएम हेल्पलाइन और जनसुनवाई में कलेक्टर मनीषसिंह से शिकायत की। सिंह ने प्रकरण जूनी इंदौर एसडीओ अंशुल खरे के पास भेजा। जहां से जांच के लिए अपर तहसीलदार प्रीति भिसे के पास प्रकरण पहुंचा। उस दौरान भू-राजस्व संहिता19 59 की धारा-109, 110 के तहत आवेदन पेश किया। उस पर 24 मार्च 2022 को भिसे ने नामांतरण करने का आदेश जारी कर दिया। उसके साथ रतनलाल से सीएम हेल्पलाइन व जनसुनवाई की शिकायत वापस लेने को कहा गया। आदेश की प्रति मिलने के बाद उन्होंने तुरंत शिकायत वापस भी ले ली। आदेश लेकर वह पटवारी संजय श्रीवास्तव के पास पहुंचे।

आग्रह किया कि नामांतरण कर दिया जाए, तब पटवारी श्रीवास्तव का कहना था कि आदेश में तो प्रकरण नंबर ही दर्ज नहीं है तो अमल कैसे कर सकता हूं? रतनलाल को लगा कि कहीं चूक हो गई होगी। वह आदेश लेकर फिर भिसे के पास पहुंचा। इस पर जवाब था कि कुछ गड़बड़ हो गई है, देखते हैं। उसके बाद से आज तक बुजुर्ग तहसील के चक्कर लगा रहा है। तहसीलदार के फर्जी आदेश को लेकर वे खूद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं।

ये कैसी लापरवाही?
रतनलाल के मामले में जब जांच हुई तो पाया गया था कि पूर्व में चलने वाली पंजी में नामांतरण हो चुका है पर वह प्रक्रिया बंद हो चुकी है। उसके आधार पर ही नामांतरण करने का आदेश दिया गया, जो गलत था। तहसीलदार को नियमानुसार शिकायतकर्ता से आवेदन पत्र लेकर आरसीएमएस में दर्ज कर आदेश जारी करना था। शिकायत पर ही बिना प्रकरण दर्ज किए आदेश दे दिया और उसकी कॉपी भी जारी कर दी। बड़ी बात ये है कि अब उचित राय भी नहीं दी जा रही है ताकि बुजुर्ग को कुछ मदद मिल सके।