
सर्वकालिक, सहज और सर्वमान्य हैं विनोबा भावे के विचार
इंदौर. आचार्य विनोबा भावे के विचार हमेशा प्रासंगिक रहने वाले, सार्वभौम यानी यूनिवर्सल और सर्वमान्य हैं। उनके विचार सहज और सर्वकालिक हैं। विनोबा भावे के विराट व्यक्तित्व का राजकीय पक्ष एक बड़ा हिस्सा है, लेकिन उनका मूल्यांकन राजनीति से ऊपर उठकर होना चाहिए। यह दु:ख की बात है कि उन्हें वैसी मान्यता नहीं मिली जिसके वे हकदार हैं। यह बात शुक्रवार से वैशाली नगर स्थित माधव विद्यापीठ में आरंभ हुई तीन दिनी राष्ट्रीय चेतना व्याख्यानमाला में मुंबई की प्रखर वक्ता धनुश्री लेले ने कही। धनुश्री ने बताया, आचार्य विनोबा भावे पर अपनी मां का गहरा प्रभाव था। उनकी मां की सरलता, सहजता के साथ ही उनके संस्कार भी अद्भुत थे। जब विनोबा ने निश्चय किया कि वे ब्रह्मचारी रहेंगे तो उनकी मां ने सहजता से स्वीकृति दी। उनकी मां का तर्क था कि विनू विवाह करेगा तो 7 पीढय़िों का उद्धार होगा, लेकिन यदि वह ब्रह्मचारी रहा तो 14 पीढ़यिां संस्कारित होंगी।
विनोबा ने सन् 1940, 1945 और १९47 में जो विचार व्यक्त किए वे आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने अपने ग्रंथ को गीताई कहा यानी गीता का जो दर्शन उन्होंने अपनी मां के व्यवहार से सीखा उसे ग्रंथ में पिरो कर गीताई के नाम से लिखा। उनका मानना था कि संस्कृति टिकेगी तो देश टिकेगा और दुनिया बदलेगी। जैसे संत ज्ञानेश्वर ने अपने अजर-अमर ग्रंथ ज्ञानेश्वरी के माध्यम से गीता सार को सरलता से समझाया है। वैसे ही आचार्य विनोबा भावे की गीताई ने अत्यंत सरल भाषा में गीता समझाई है। कार्यक्रम के प्रारंभ में मुख्य अतिथि अण्णा महाराज ने राष्ट्र चेतना व्याख्यानमाला का शुभारंभ किया। व्याख्यानमाला के संयोजक सुनील धर्माधिकारी, प्रशांत बडवे और मोहन रेडगांवकर ने बताया, तीन दिनों के कार्यक्रम को शहर के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता वंसत बोचरे, प्रदीप कुलकर्णी और चंद्रशेखर येवतीकर की स्मृति में किया जा रहा है। आयोजन में विनोबा भावे पर हुए व्याख्यान पर आधारित क्विज भी हुई।
Published on:
28 Dec 2019 02:16 am
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