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41 विजयी युद्ध और 20 की उम्र में पेशवा, ये है बाजीराव की कहानी…

हिंदुस्तान के इतिहास का बाजीराव अकेला ऐसा योद्धा था, जिसने 41 लड़ाईयां लड़ीं और एक भी नहीं हारी।

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Abha Sen

Jan 16, 2016

जबलपुर। आंधी रोके तो हम तूफान, तूफान रोके तो हम आग का दरिया, ये शपथ है बाजीराव बल्लाल की। फिल्म के डायलॉग लाजवाब हैं, जिन्हें सुनकर एक ओर युवावर्ग जोश से भर उठता है। वहीं दूसरी ओर महान योद्धा बाजीराव के बारे में जानने की उत्सुकता होने लगती है। जी हां, बाजीराव बल्लाल एक महान योद्धा ही नहीं बल्कि उन महान शासकों की श्रेणी में आते हैं जिन्हें जनहितकारी कार्यों के लिए जाना जाता है।

संजय लीला भंसाली की फिल्म बाजीराव-मस्तानी में बाजीराव के संबंध में कुछ बातें जानने मिलीं, लेकिन हम आपको इस महान शासक की कुछ और ऐसी ऐतिहासिक बातें बता रहे हैं जो या तो सिर्फ इतिहासकारों तक ही सीमित हैं या इस क्षेत्र में रुचित रखने वाले कम ही लोग जानते हैं-

हिंदुस्तान के इतिहास का बाजीराव अकेला ऐसा योद्धा था, जिसने 41 लड़ाईयां लड़ीं और एक भी नहीं हारी। वर्ल्ड वॉर सेकंड में ब्रिटिश आर्मी के कमांडर रहे मशहूर सेनापति जनरल मांटगोमरी ने भी अपनी किताब च्हिस्ट्री ऑफ वॉरफेयरज् में बाजीराव की बिजली की गति से तेज आक्रमण शैली की जमकर तारीफ की है और लिखा है कि बाजीराव कभी हारा नहीं।

आज वो किताब ब्रिटेन में डिफेंस स्टडीज के कोर्स में पढ़ाई जाती है। इतिहासकारों के अनुसार, बाद में यही आक्रमण शैली सेकंड वर्ल्ड वॉर में अपनाई गई, जिसे ब्लिट्जक्रिग बोला गया। निजाम पर आक्रमण के एक सीन में भंसाली ने उसे दिखाने की कोशिश भी की है।


बाजीराव पहला ऐसा योद्धा था, जिसके समय में 70 से 80 फीसदी भारत पर उसका सिक्का चलता था। वो अकेला ऐसा राजा था जिसने मुगल ताकत को दिल्ली और उसके आसपास तक समेट दिया था। पूना शहर को कस्बे से महानगर में तब्दील करने वाला बाजीराव बल्लाल भट्ट था, सतारा से लाकर कई अमीर परिवार वहां बसाए गए। निजाम, बंगश से लेकर मुगलों और पुर्तगालियों तक को कई-कई बार शिकस्त देने वाली अकेली ताकत थी बाजीराव की। शिवाजी के नाती शाहूजी महाराज को गद्दी पर बैठाकर बिना उसे चुनौती दिए, पूरे देश में उनकी ताकत का लोहा मनवाया था बाजीराव ने।

उसे टैलेंट की इस कदर पहचान थी कि उसके सिपहसालार बाद में मराठा इतिहास की बड़ी ताकत के तौर पर उभरे। होल्कर, सिंधिया, पवार, शिंदे, गायकवाड़ जैसी ताकतें जो बाद में अस्तित्व में आईं, वो सब पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट की देन थीं।


आज भले ही नई पीढ़ी के सामने उसे भंसाली की फिल्म के जरिए हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल के तौर पर पेश किया गया हो, लेकिन शिवाजी से प्रेरणा लेकर देश में पहली बार हिंदू पद पादशाही का सिद्धांत भी बाजीराव प्रथम ने दिया और उसे विकसित अवस्था तक पहुँचाया। हर हिंदू राजा के लिए आधी रात मदद करने को तैयार था वो, पूरे देश का बादशाह एक हिंदू हो, उसके जीवन का ये लक्ष्य था, लेकिन जनता किसी भी धर्म को मानती हो उसके साथ वो न्याय करता था। उसकी अपनी फौज में कई अहम पदों पर मुस्लिम सिपहसालार थे, लेकिन वो युद्ध से पहले हर हर महादेव का नारा भी लगाना नहीं भूलता था।

इतिहासकार आनंद सिंह राणा के अनुसार बाजीराव 20 साल की उम्र पेशवा बन गए थे। 1700 में जन्म व 1740 में इनका देहावसान हो गया। 40 साल की कम आयु में इन्होंने देह त्याग दी, लेकिन इतिहास का यह एक ऐसा किरदार है जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकेगा। आज भी जबलपुर सहित विभिन्न जिलों और राज्यों के शोधार्थियों के बीच ये अध्ययन का विषय हैं।