जबलपुर. कुछ सालों पूर्व तक मधुमक्खी पालन गिनती के गिने-चुने लोग किया करते थे। जागरुकता की कमी और तकनीकी ज्ञान के अभाव के चलते भी लोग मधुमक्खी पालन से जुड नहीं पा रहे थे। लेकिन समय के साथ बढ़ी जागरूकता, तकनीकी प्रशिक्षण के साथ ही रोजगार का बड़ा क्षेत्र होने के कारण अब युवा वर्ग भी इस दिशा में आगे आने लगा है। मधुमक्खी पालन को अपनाकर अपनी अजीविका को भी बढ़ा रहे हैं तो वहीं आत्मनिर्भर भी बन रहे हैं। महाकौशल अंचल में ही हाल ही के वर्षों में दो सैकड़ा से अधिक लोगों ने मधुमक्खी पालन का व्यवसाय कर रहे हैं। जबकि इनकी संख्या कभी 50 के अंदर थी। महाकोशल एवं बुंदेलखंड अंचल में 500 से अधिक लोगों ने इसे व्यवसाय के रूप में अपना लिया है।
हर साल जुड़ रहे 25 लोग
जबलपुर जिले से ही हर साल 20 से 25 लोग मधुमक्खी पालन व्यवसाय से जुड़ रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र भी इसमें इनकी मदद कर रहा है। मधुमक्खी पालन का आवश्यक प्रशिक्षण से लेकर तकनीकी सहायता, उत्पाद के विपणन दूसरे जिलों में एक्सपोजर विजिट आदि उपलब्ध कराई जा रही है। जिले में कुंडम, शहपुरा, मझौली, रांझी जैसे इलाकों में मधुमक्खी पालन का व्यवसाय किया जा रहा है।
महाकोशल अंचल बन रहा केंद्र
बुंदेलखंड क्षेत्र में मधुमक्खी पालन तो होता था लेकिन अब महाकोशल अंचल एक केंद्र बन रहा है। अंचल से लगे जबलपुर, सिवनी, मंडला एवं बालाघाट में इसका व्यवसाय किया जा रहा है। व्यापारियों द्वारा कामर्शियल रूप से शहद का उत्पादन कर बाजार में भी बेचा जा रहा है। हल साल 20 हजार किलो शहर का उत्पादन हो रहा है। तेजी से बढ़ी उपयोगिता विशेषज्ञों के अनुसार प्राकृतिक शहद की हर जगह मांग है। द्वारका लोधी, मनोज पटेल ने मधुमक्खी पालन को व्यवसायिक रूप दे दिया है। आवश्यकता और मांग के अनुसार 200 से 250 किलो शहद का उत्पादन कर रहे हैं। ऐसे कई अन्य लोगों की है जो इस व्यवसाए से जुड़ रहें हैं।
-मधुमक्खी पालन में जागरूकता आई है। कुछ साल पहले तक गिनती के लोग इस व्यवसाय को अपनाते थे। सात सालों के दौरान ही यह संख्या सैकड़ों में हो गई है। ऐसे युवाओं को हम हर तरह से प्रशिक्षण देकर दक्ष बना रहे हैं। -डॉ. मनोज अहिरवार, कृषि वैज्ञानिक