
Chinnamasta Jayanti ,
जबलपुर। वैसे तो हम रोज ही ईश्वर की आराधना करते हैं पर कुछ पर्व, व्रत, तिथि, जयंती पर पूजन का अलग ही महत्व है। जैसे नवरात्र में देवी पूजन का विशेष फल मिलता है वैसे ही मां छिन्नमस्तिका के प्राकट्य दिवस पर भी देवी पूजन का महत्व है। 30 अप्रेल को मां छिन्नमस्तिका जयंती है। दस महाविद्याओं में देवी छिन्नमस्तिका छठी महाविद्या कहलाती हैं। यह जयंती भारतवर्ष में धूमधाम से मनाई जाती है। सभी भक्त इस दिन माता की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। माता छिन्नमस्तिका के दरबार में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु माथा टेकने आते हैं। छिन्नमस्तिका देवी को मां चिंतपूर्णी के नाम से भी जाना जाता है।
पंडित जनार्दन शुक्ला के अनुसार देवी के इस रूप के विषय में कई पौराणिक धर्म ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। मार्कंडेय पुराण, शिवपुराण आदि में देवी के इस रूप का विशद वर्णन किया गया है। इनके अनुसार जब देवी ने चंडी का रूप धरकर राक्षसों का संहार किया और देवताओं को विजय दिलवाई तो चारों ओर उनका जयघोष होने लगा परंतु देवी की सहायक योगिनियां अजया और विजया की रुधिर पिपासा शांत नहीं हो सकी। इस पर उनकी रक्त पिपासा को शांत करने के लिए मां ने अपना मस्तक काटकर अपने रक्त से उनकी प्यास बुझाई। इसीलिए माता को छिन्नमस्तिका नाम से भी पुकारा जाने लगा। माना जाता है कि जहां भी देवी छिन्नमस्तिका का निवास होता है, वहां चारों ओर भगवान शिव का स्थान भी होता है। इसकी सत्यता इन जगहों से साबित हो जाती है। कालेश्वर महादेव, मुच्कुंड महादेव तथा शिववाड़ी जैसे शिव मंदिर उन्हीं स्थानों में से एक हैं, जहां मां के स्थानों के चारों ओर भगवान शिव के स्थान भी हैं।
ऐसे करें देवी पूजन
माता छिन्नमस्तिका के मंदिर देश में दुर्लभ हैं। माता का यह रूप तांत्रोक्त पूजन के लिए श्रेष्ठ है पर सामान्य जनों को ऐसी कठिन आराधना से बचना ही चाहिए। पंडित दीपक दीक्षित बताते हैं किकहीं से भी माता छिन्नमस्तिका का चित्र प्राप्त करें और उसकी विधि विधान से पूजा करें। घर में दुर्गा देवी के विग्रह या चित्र की भी पूजा कर सकते हैं। फिर नवार्ण मंत्र ऊं एैं ह्री क्लीं चामुंडाय विच्चै- इस मंत्र का मनोयोग से कम से कम १०८ बार जाप करें। जितना ज्यादा जाप करेंगे उतना अच्छा फल प्राप्त होगा।
Published on:
27 Apr 2018 08:39 am
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